नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के कई आश्रय गृहों में बच्चों के शारीरिक और यौन शोषण के आरोपों के बावजूद उचित कार्रवाई नहीं करने पर राज्य सरकार के आचरण को मंगलवार को ‘बहुत ही शर्मनाक’ और ‘अमानवीय’ करार दिया था. कोर्ट ने ऐसे मामलों में केन्द्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराने की हिमायत की थी. बुधवार को कोर्ट ने टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) की रिपोर्ट में बिहार के 17 आश्रय गृहों पर गंभीर चिंता व्यक्त की और इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी.

सुप्रीम कोर्ट ने श्रम गृहों की जांच सीबीआई को नहीं सौंपने का बिहार सरकार का अनुरोध ठुकरा दिया. सीबीआई ने कोर्ट से कहा कि मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामले में सात दिसंबर तक आरोपपत्र दाखिल कर दिया जाएगा. न्यायालय ने कहा बिहार में आश्रय गृह की जांच कर रहे सीबीआई अधिकारियों का तबादला बिना उसकी (न्यायालय) पूर्व अनुमति के नहीं किया जाए.

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इससे पहले मंगलवार को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने तल्ख शब्दों में कहा कि ऐसे अपराध करने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के मामले में सरकार का रवैया ‘बहुत ही नरम’ और ‘पक्षपातपूर्ण’ रहा है. पीठ ने बिहार सरकार से सवाल किया कि था कि क्या ये बच्चे इस देश के नागरिक नहीं हैं? शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार की ओर से पेश वकील से सवाल किया था कि आश्रय गृहों में बच्चों के साथ अप्राकृतिक अपराध के आरोपों के बावजूद ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गयीं?

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पीठ ने राज्य सरकार के वकील से कहा कि आप क्या कर रहे हैं? यह बहुत ही शर्मनाक है. आपने विस्तृत हलफनामा (न्यायालय में) दाखिल किया होगा परंतु यदि किसी बच्चे के साथ अप्राकृतिक अपराध किया गया है तो आप यह नहीं कह सकते कि यह कुछ नहीं है. आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? यह अमानवीय है. इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गुप्ता ने आरोपों और उनसे निबटने की पुलिस की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हर बार जब मैं यह फाइल पढ़ता हूं, मैं मामले की त्रासदी से रूबरू होता हूं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. पीठ ने कहा था कि हमारा यही मानना है कि राज्य पुलिस अपेक्षा के अनुरूप अपना काम नहीं कर रही है. हम चाहेंगे कि सीबीआई इन आरोपों की जांच करे.

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बिहार सरकार के वकील ने न्यायालय को आश्वासन दिया कि सरकार इस मामले में सभी उचित कदम उठायेगी और वह अपनी सभी गलतियों को सुधारेगी. याचिकाकर्ता फौजिया शकील की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफडे ने दावा किया कि राज्य सरकार इन मामलों में ‘नरम’ रूख अपना रही है और इन मामलों में कम गंभीर अपराध के तहत प्राथमिकी दर्ज की गयी हैं. नफडे ने टिस की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि आश्रय गृहों में कई बच्चों के साथ दुराचार किया गया है और इनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत मामला बनता है.

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बिहार के वकील ने जब यह कहा कि प्राथमिकी में पोक्सो के प्रावधानों को शामिल किया गया है तो पीठ ने कहा, ‘‘यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गयी हो और प्राथमिकी सिर्फ मामूली चोट का जिक्र करे तो आपको क्या लगता है कि इसे हम स्वीकार करेंगे. इस पर राज्य सरकार के वकील ने कहा कि वह सुनिश्चित करेंगे की दर्ज प्राथमिकी में धारा 377 भी जोड़ी जाये. पीठ ने सरकार के वकील से कहा, ‘‘अपने मुख्य सचिव (जो न्यायालय में मौजूद थे) से पूछिये. हमें पहले बताया गया था कि सरकार पूरी गंभीरता से मामलों पर गौर करेगी और यह गंभीरता आप दिखा रहे हैं. यह विडंबना है.’’ पीठ ने कहा, ‘‘बिहार सरकार का यह रवैया है.’’ पीठ ने शुरू में राज्य सरकार के वकील से कहा कि 24 घंटे के भीतर इन मुद्दों को ठीक किया जाए.