नई दिल्ली. आज ‘खट्टर काका’ को याद करने का दिन है, क्योंकि उन्हें इस चराचर जगत में लाने वाले प्रो. हरिमोहन झा की आज पुण्यतिथि है. बिहार के वैशाली जिले के बाजितपुर में जन्मे प्रो. हरिमोहन झा ने मिथिला पर केंद्रित अनेकों रचनाएं की. ‘कन्यादान’, ‘प्रणम्य देवता’, ‘जीवन यात्रा’, ‘खट्टर ककाक तरंग’ आदि. सारी रचनाएं मैथिली में की गई थीं, जिनका बाद में विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया. इनमें सबसे चर्चित रचना ‘खट्टर ककाक तरंग’ रही. मैथिली साहित्य में यह एक अनुपम कृति है. इसे बाद में ‘खट्टर काका’ नाम से हिन्दी में प्रकाशित किया गया.

हास्य, व्यंग्य, कटाक्ष के जरिए सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों पर किए गए उनके प्रहार ने हिन्दी में भी धूम मचा दी. प्रकाशक ने इसके कई संस्करण छापे. भांग के नशे में पाखंड पर किया गया इनका कटाक्ष अद्भुत है. शास्त्र हों या पुराण, वेद हो या गीता, हरिमोहन झा ने सब में विनोद ढूंढ़ा और उससे जुड़ी भ्रांतियों को उजागर किया. मिथिला की संस्कृति का करीब से किया गया उनका अवलोकन, उनकी कृतियों में स्पष्ट रूप से दिखता है. वे आज भी मैथिली में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखकों में से एक हैं. आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उनकी उसी प्रसिद्ध रचना ‘खट्टर काका’ के कुछ अंशों को प्रकाशित कर रहे हैं. आप भी पढ़ें…

‘रामायण’ से
लेखक- खट्टर काका आज रामलीला है, चलिएगा. खट्टर काका बोले- मैं नहीं जाऊंगा. लेखक ने कहा-चलिए. मर्यादा पुरुषोत्तम एक से एक आदर्श दिखा गए हैं. खट्टर काका बोले- हां सो तो दिखा ही गए हैं. अबला को कैसे दुख देना चाहिए. सती-साध्वी को कैसे घर से निकाल देना चाहिए. किसी स्त्री की नाक कटवा दो. किसी स्त्री पर तीर छोड़ दो. समझो तो नारी को रुलाने से ही राम की वीरता शुरू होती है और समाप्त होती है.

 

राजकमल प्रकाशन ने छापी थी हिन्दी में खट्टर काका.

राजकमल प्रकाशन ने छापी थी हिन्दी में खट्टर काका.

 

‘गीता’ से
खट्‍टर काका के होंठों पर मुस्कान आ गई. बोले- श्रीकृष्ण अर्जुन को तो यह उपदेश देते हैं कि क्षत्रिय के लिए राज छोड़कर भाग जाने से मरण अच्‍छा है और स्वयं जो रण छोड़कर भागे सो अभी तक रणछोड़ कहला रहे हैं. इसी को कहते हैं- परोपदेशे पांडित्यम्. लेकिन अर्जुन को इतनी बुद्धि कहां कि जवाब दे सकते. गटगट सुनते गए और जब सब कुछ सुनकर भी अर्जुन के पल्ले कुछ नहीं पड़ा, तब कृष्ण ने अपना विकराल रूप दिखाकर अर्जुन को डरा दिया. यदि उस तरह नहीं समझोगे तो इस तरह समझो.’

‘काव्य का रस’ से
खट्टर काका बोले- हां, निरंकुशाः कवयः! कवियों की कविता पर ‘कविका’ (लगाम) नहीं लगती. उन्हें ‘कच कुच कटाक्ष’ वर्णन करने की पूरी तरह छूट मिली हुई है. जिन बातों से उन्हें वाहवाही मिलती है, उन्हीं से औरों की तबाही हो जाए. देखो! नमक और लवण एक ही चीज है. ‘लावण्यमयी’ बाला कहो तो प्रसन्न हो जाएगी. ‘नमकीन लड़की’ कह दो तो सन्न रह जाएगी. कोई दूसरा इस तरह नारंगी-अनार की बातें बोले तो गंवार कहलाएगा. लेकिन कवि लोग तो अनार का नाम ही कुचफल रखे हुए हैं. किसी और भाषा के कोष में ऐसा रसीला शब्द मिलेगा?

‘आयुर्वेद’ से
मुझे चकित देखकर खट्‍टर काका बोल उठे- हंसी नहीं करता हूं. राजा लोगों को जीवन में दो ही वस्तुओं से प्रयोजन था. पाचक और मोदक. भोजन शक्ति को उद्दीप्त करने के लिए क्षुधाग्नि-संदीपन. योग शक्ति को उद्दीप्त करने के लिए कामाग्नि-संदीपन. राजा लोग दिन भर पड़े-पड़े दोनों अर्थों में कुमारिकासव पान किया करते थे. इतना ही तो काम था. रोज-रोज वही दिनचर्या. कहां तक सहते? इसी से बेचारे वैद्यगण रात-दिन वाजीकरण के पीछे बेहाल थे. एक से एक स्तंभन वटी, वानरी गुटिका, कामिनी-विद्रावण! इन्हीं बातों में रिसर्च की बुद्धि खर्च होने लगी.

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‘प्राचीन संस्कृति’ से
मैं इसका मतलब यों लगाता हूं. सतयुग में हमारे पूर्वज स्वच्छंद विचरते थे. यायावरों की तरह. त्रेता में थोड़ी स्थिरता आने लगी. राजा जनक प्रभृति हल जोतने लगे. मिट्‍टी से अन्नरूपी सीता निकलने लगी. लोग घर बनाकर रहने लगे. एक स्थान में पैर जमने लगा. द्वापर में लोग और सुभ्यस्त हुए. सुख के साधन बढ़े. लोग आराम में आकर ऊंघने लगे. और कलियुग में तो विलासिताओं की सीमा ही नहीं. लोग निश्चिंत होकर सो रहे हैं. इसी तरह सभ्यता का क्रमिक विकास हुआ है.