नई दिल्ली. आनंद कुमार या सुपर 30 वाले आनंद कुमार आज परिचय के मोहताज नहीं हैं. मंगलवार को आनंद कुमार इंडिया.कॉम के दफ्तर आए और फेसबुक के जरिए हमारे पाठकों से ढेर सारी बातें की. इस दौरान उन्होंने अपने जीवन संघर्ष और सुपर 30 के विकास की कहानी शेयर की. आनंद कुमार की यह संस्था गरीब बच्चों को इंजीनियरिंग की तैयारी कराती है. वर्ष 2002 से शुरुआत कर यह संस्था अभी 16वें साल में है. आनंद कुमार ने बताया कि महज डेढ़ दशकों में संस्था ने अब तक 450 बच्चों को इंजीनियरिंग की तैयारी कराई है, जिनमें से 396 बच्चे आईआईटी में दाखिला पाने में सफल रहे, बाकी देश के अन्य इंजीनियरिंग संस्थानों में पढ़ रहे हैं. यानी 100 में 90 अंक पाने का दुर्लभ संयोग. सुपर 30 से पढ़कर निकले बच्चे आज की तारीख में देश के बाहर या देश में ही बड़ी-बड़ी कंपनियों में या तो ऊंचे पदों पर हैं या कंपनी ही चला रहे हैं. इंडिया.कॉम में आनंद कुमार ने जो अपने जीवन की कहानी बताई और सुपर 30 की वेबसाइट पर दिए गए विवरण को हम आनंद कुमार के ही भावों में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.

सुनहरी यादें - अपनी संस्था के बच्चों के साथ आनंद कुमार. (फोटो साभारः सुपर 30)

सुनहरी यादें – अपनी संस्था के बच्चों के साथ आनंद कुमार. (फोटो साभारः सुपर 30)

 

मैं आनंद कुमार
हमारा नाम आनंद है. लोग आनंद कुमार भी कहते हैं. कई लोग सुपर 30 वाला आनंद भी कहते हैं. बिहार की राजधानी है न, पटना! वहीं रहते हैं. बिहार को इतिहास प्रसिद्ध गणितज्ञ आर्यभट्ट के लिए जाना जाता है. हमको भी बचपन से गणित पढ़ने की ललक थी. माताजी-पिताजी भी चाहते थे कि पढ़-लिखकर बड़े आदमी बने. पिताजी डाक विभाग में किरानी थे. घर की आय बहुत सीमित थी. फिर भी पढ़ाई-लिखाई के प्रति बहुत सचेत रहते थे. इसलिए हमारी शिक्षा का भी उन्होंने हमेशा ध्यान रखा. ऐसा नहीं था कि हम पढ़ने में बहुत तेज थे या सिर्फ गणित पढ़ते रहते थे. पिताजी हमको वैज्ञानिकों की जो जीवनी पढ़ने को देते थे न, उससे गणित के प्रति लगाव बढ़ता चला गया.

यह भी पढ़ें – जेईई की तैयारी के लिए आनंद कुमार ने दिए टिप्स

सुपर 30 में बच्चों को पढ़ाते आनंद कुमार. (फोटो साभारः सुपर 30)

सुपर 30 में बच्चों को पढ़ाते आनंद कुमार. (फोटो साभारः सुपर 30)

 

आर्थिक तंगी बड़ी वजह
मैट्रिक पास करते-करते गणित के प्रति हमारी रुचि अगाध हो गई. ग्रेजुएशन में आने के बाद मेरी कुछ थ्योरी गणित के प्रसिद्ध जर्नलों में प्रकाशित हो गई. इससे थोड़ा-बहुत नाम हो गया. लोग जानने लगे. इसी बीच कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से एक स्कॉलरशिप मिली, लेकिन घर में पैसे की कमी के कारण हम कैंब्रिज नहीं जा पाया. पिताजी के लिए भी यही दुख भारी पड़ा और वे चल बसे. उनके निधन के बाद लोगों ने अनुकंपा पर नौकरी कर लेने की बात कही, लेकिन हमारी मां इस आड़े वक्त में मजबूत बन गईं. उन्होंने कहा- बेटा तेरा जिसमें दिल लगता है, वह काम करो. इसके बाद दोस्तों ने झुग्गी बस्तियों में रहने वाले बच्चों को गणित पढ़ाने की सलाह दी. यहीं से हमारा सफर शुरू हुआ. ‘रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स’ खुला और हम बच्चों को गणित पढ़ाने लगे.

आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को इंजीनियरिंग की तैयारी कराती है यह संस्था. (फोटो साभारः सुपर 30)

आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को इंजीनियरिंग की तैयारी कराती है यह संस्था. (फोटो साभारः सुपर 30)

 

आनंद की फिल्म – हृतिक रोशन ही क्यों बने आनंद कुमार की पसंद

सुपर 30 का आइडिया
इसी क्रम में बिहार में पढ़ने वाले गरीब तबके के बच्चों को इंजीनियरिंग की तैयारी कराने का ख्याल आया. दोस्तों और परिचितों से बात की. इसके बाद ही सुपर 30 की स्थापना के विचार ने जन्म लिया. इसके तहत ऐसे बच्चों को पढ़ाने का विचार था जो पैसों की तंगी की वजह से अच्छे स्कूल नहीं जा पाते हैं. इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए जरूरी महंगी किताबें नहीं खरीद पाते हैं. हमने ऐसे ही बच्चों को इंजीनियर बनाने का निर्णय लिया. इस तरह पहली बार बिहार में, या यों कह लें पूरे देश में ही सुपर 30 जैसी संस्था अस्तित्व में आई. इस संस्था में पढ़ने वाले बच्चों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए मेरी मां ने इनके रहने और खाने-पीने की जिम्मेदारी भी खुद ही उठाने की सलाह दी. जहां तक बात रही पैसों की, तो मैं जो ट्यूशन पढ़ाता था, उसी से सुपर 30 के बच्चों की पढ़ाई होने लगी.

परीक्षा की सफलता का श्रेय अपने शिक्षक से साथ बांटते सुपर 30 के छात्र. (फोटो साभारः सुपर 30)

परीक्षा की सफलता का श्रेय अपने शिक्षक से साथ बांटते सुपर 30 के छात्र. (फोटो साभारः सुपर 30)

 

2008 में जादूई आंकड़ा
स्थापना के बाद से ही सुपर 30 के बच्चों ने कमाल दिखाना शुरू कर दिया. पहले साल 30 में से 18, फिर 22, 26 इसके बाद 28 लड़के आईआईटी में चुने गए. हमारी सफलता अब दुनिया देख रही थी. बिहार के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी सुपर 30 की चर्चा होने लगी थी. इस संस्था और यहां की पढ़ाने की अनोखी शैली ने दुनिया का ध्यान खींचा था. लेकिन अब तक हमने शत-प्रतिशत सफलता का स्वाद नहीं चखा था. वह दुर्लभ अवसर आया वर्ष 2008 में, जब सुपर 30 के 30 में से 30 बच्चों ने अपना ‘गोल’ अचीव कर लिया. सभी के सभी बच्चे आईआईटी के लिए सेलेक्ट हो गए. यह सफलता थी, लेकिन चुनौतियां और बढ़ गई थी. अब हमें हर साल इस आंकड़े को छूना था. और बताते हुए गर्व हो रहा है कि सुपर 30 के बच्चों ने अगले दो वर्षों, 2009 और 2010 में भी यही सफलता दोहराई. हमारा यह संघर्ष आज भी निरंतर जारी है.