नीतीश कुमार घर वापसी की राह पर हैं. करीब एक साल पहले महागठबंधन छोड़ बीजेपी का उन्होंने फिर से दामन पकड़ा था. इससे पहले तक वे लालू प्रसाद यादव के राजद और कांग्रेस के साथ थे. प्रशासन में राजद नेताओं के हस्तक्षेप से परेशान होकर उन्होंने सुशासन के दावे के साथ भाजपा की अंगुली पकड़ी थी, लेकिन लगता है यह साथ अब फिर से छूटने वाला है. नीतीश ने अब तक इस पर कुछ स्पष्ट नहीं कहा है लेकिन पिछले 10-15 दिनों में उनके साथ-साथ उनकी पार्टी के नेताओं के सुर भी बदल गए हैं.Also Read - Who is Sukanta Majumdar: बंगाल भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष बने सुकांत मजूमदार, जानें कौन हैं यह

एक साल पहले कहा था मोदीजी से मुकाबला कौन करेगा
पिछले साल बीजेपी के साथ गठबंधन कर दोबारा सीएम बनने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने 2019 के आम चुनावों के बारे में पूछे जाने पर कहा था कि मोदीजी से मुकाबला करने की क्षमता किसी में नहीं है. लेकिन एक साल बाद ही वे सार्वजनिक मंचों से नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना करने लगे हैं. और तो और, पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने तो बीजेपी को स्पष्ट कह दिया कि 2019 के आम चुनावों में जदयू राज्य में सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. बीजेपी को यह मंजूर नहीं हो तो वह अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर सकती है. Also Read - योगी आदित्यनाथ ने कहा- यूपी में जनसंख्या नियंत्रण कानून 'सही समय' पर आएगा, जो करेंगे नगाड़ा बजाकर करेंगे

क्यों बदल रहा है नीतीश का रुख
दरअसल, बीजेपी और जदयू के बीच तनातनी की मुख्य वजह सीटों का बंटवारा तो है ही, कई और मुद्दे हैं जो विवाद का कारण बने हुए हैं. जदयू ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजद के साथ गठबंधन तोड़ा था, लेकिन इसके बाद कई भाजपा नेताओं और मंत्रियों के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं. जदयू चाहकर भी इसके खिलाफ आवाज नहहैीं उठा पा रहा है. एक मुद्दा नीतीश कुमार की राजनीतिक विश्वसनीयता का भी है. बार-बार गठबंधन के साझीदार बदलने से यह धारणा बनने लगी है कि नीतीश अवसरवादी और समझौतावादी हैं. वे सिद्धांतों का हवाला भले दें, लेकिन वे अपने राजनीतिक फैसले नफा-नुकसान के तराजू पर ही तौल कर लेते हैं. इन सबसे अलग एक सवाल नीतीश की राजनीतिक हैसियत का भी है. महागठबंधन में रहते हुए नीतीश की छवि एक राष्ट्रीय नेता की बन रही थी. लोग उन्हें नरेंद्र मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मानने लगे थे, लेकिन राजग में आने के बाद से बिहार में भी जदयू की हैसियत जूनियर पार्टनर की रह गई है. Also Read - BJP विधायक के भाई ने बदमाशों को AK-47 दी, 188 कारतूस भी मिले, बिहार का सियासी पारा चढ़ा

किसको कितना फायदा
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में यह कहना मुश्किल है कि राजग से बाहर निकलने पर बीजेपी या जदयू में किसको ज्यादा फायदा होगा. यह तय है कि नीतीश के राजग छोड़ने पर बिहार में नए सिरे से राजनीतिक ध्रुवीकरण होगा. जदयू को महागठबंधन में जगह मिलने पर भी संदेह है. राजद नेता तेजस्वी यादव पहले ही इसे स्पष्ट कर चुके हैं. बीजेपी के लिए भी राजद, कांग्रेस और जदयू से अलग छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करना मजबूरी हो जाएगी. यदि ऐसा हो गया कि दोनों पार्टियां 2019 के चुनाव में अकेले उतरती हैं तो राजद-कांग्रेस गठबंधन के लिए रास्ते आसान हो जाएंगे.

राजग में दरार के संकेत
इन सबके बीच बड़ा सवाल यह है कि क्या 2019 के चुनाव आते-आते राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल दल एक रह पाएंगे. छह महीने पहले तक गठबंधन के भविष्य को लेकर कोई संदेह नहीं था, लेकिन उत्तर प्रदेश के उपचुनाव और फिर कर्नाटक विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार के बाद गठबंधन के साझीदार दल उस पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. तेलुगू देशम पार्टी पहले ही गठबंधन से बाहर हो चुकी है, जम्मू कश्मीर में पीडीपी से बीजेपी खुद ही अलग हो गई है और महाराष्ट्र में शिवसेना 2019 का चुनाव अकेले लड़ने का कई बार संकेत दे चुकी है. बिहार में ही लोकजनशक्ति पार्टी और रालोसपा भी अपनी बाहें फड़काने लगे हैं. तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक को छोड़ किसी दूसरी पार्टी के राजग में शामिल होने की फिलहाल संभावना नहीं दिखती. ऐसे में यदि नीतीश राजग के पाले से बाहर निकलते हैं तो जदयू से ज्यादा मुश्किलें बीजेपी को होंगी. बीजेपी और राजग के लिए चुनौती अपनी वजूद और हैसियत बचाने की होगी तो नीतीश के लिए अपनी पालाबदल छवि से बाहर निकलने की होगी.