Crude oil price: इंटरनेशनल मार्केट में तीन गुना बढ़े कच्चे तेल के दाम, फिर भी तेल उत्पादकों को क्यों हो रहा है नुकसान?

Crude oil price: पिछेल साल अप्रैल से क्रूड के दाम 20 डॉलर से बढ़कर 60 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए हैं, फिर भी तेल उत्पादकों को नुकसान हो रहा है.

Updated: February 23, 2021 11:50 AM IST

By India.com Hindi News Desk | Edited by Manoj Yadav

Crude oil price: इंटरनेशनल मार्केट में तीन गुना बढ़े कच्चे तेल के दाम, फिर भी तेल उत्पादकों को क्यों हो रहा है नुकसान?
(FILE PIC)

Crude oil price: कोरोना महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन (Lockdown) में तेल की खपत कम होने के कारण तेल की मांग (Oil demand) घटने से भाव घटकर 20 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए थे, जो अब बढ़कर 60 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए हैं. लेकिन तेल उत्पादकों को अभी भी नुकसान हो रहा है. निचले स्तरों से तेल के दाम तीन गुना ऊपर पहुंच चुके हैं. लेकिन यह उनके लिए पर्याप्त नहीं है. उनका कहना है कि महामारी से पैदा हुए संकट से अभी तक उबर नहीं पा रहे हैं. तेल क्षेत्र में हमारे सामने अस्तित्व की लड़ाई है.

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एक बैरल तेल की कीमत 60 डॉलर डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है. लेकिन, पिछले साल अप्रैल में कच्चे तेल की कीमतें (Crude oil price) 20 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं. पिछले अप्रैल माह से कच्चे तेल की कीमतों में अब तक तीन गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. लेकिन इससे तेल निर्यातकों का पेट नहीं भर रहा है. उनको अभी भी नुकसान उठाना पड़ रहा है.

अपने बजट को संतुलित करने के लिए सऊदी अरब अगले साल वह कच्चा तेल 68 डॉलर प्रति बैरल पर बेचना चाहेगा.

इराक के लिए, आदर्श मूल्य 80 डॉलर प्रति बैरल होना चाहिए. क्या तेल इन स्तरों को छुएगा? जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप किन अनुमानों पर विश्वास करते हैं.

गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि तेल की कीमतों में इस साल 20 फीसदी का उछाल आएगा. दूसरी ओर, विश्व बैंक इतना आशावादी नहीं है.

विश्व बैंक का कहना है कि 2022 तक तेल की कीमतें 50 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहेंगी. इसका असर तेल निर्यातक देशों के बजट पर होगा. तेल निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

अरब राज्यों का रीजनल एसोसिएशन पहले से ही बजट घाटे की भविष्यवाणी कर रहा है. पिछले साल यह घाटा नौ फीसदी से थोड़ा अधिक था.

2021 में, यह छह फीसदी के करीब होगा और भविष्य में नुकसान और बढ़ सकता है. 2020 और 2023 के बीच, GCC देशों का घाटा 490 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है.

इस घाटे को पूरा करने के लिए विकल्पों की कमी की वजह से 2020 में अधिक उधार लेने के लिए मजबूर कर दिया. पिछले साल के एक अनुमान से पता चलता है कि जीसीसी सरकार का कर्ज 100 अरब डॉलर बढ़ सकता है.

प्रमुख तेल उत्पाक देश अभी भी महामारी के झटके से उबर रहे हैं और वे बिक्री किए जा रहे हर बैरल पर नजर बनाए हुए हैं. दुनिया की सबसे बड़ी तेल उत्पादक कंपनियां भी अरबों का नुकसान उठा रही हैं.

इस महीने, उन्होंने रिकॉर्ड वार्षिक नुकसान की सूचना दी है.

अमेरिका के सबसे बड़े तेल उत्पादक, एक्सॉन मोबिल को 20 बिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ है. कंपनी के इतिहास में पहली बार वार्षिक नुकसान की खबर दी है. कोनोको फिलिप्स को 2.7 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ. यूनाइटेड किंगडम में, ऊर्जा समूह बीपी ने 5.7 बिलियन घाटे की सूचना दी.

यह एक संकेत है. दुनिया खुद को तेल से दूर करना चाहती है. इसका मतलब तेल उत्पादकों के लिए अगले 20 वर्षों में खरबों डॉलर का नुकसान होगा.

दुनिया के लगभग 40 देश, जिनकी ज्यादातर कमाई कच्चे तेल की बिक्री से होती है. उनके राजस्व में औसतन 46 फीसदी की गिरावट देखी जा सकती है.

पेरिस समझौते के उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय पहल के कारण अगले 20 वर्षों में कुल 9 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है.

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Published Date: February 23, 2021 11:46 AM IST

Updated Date: February 23, 2021 11:50 AM IST