Defence Budget 2021: भारत सबसे तेज़ बढ़ने वाले सकल घरेलु उत्पाद के साथ दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में भी शामिल है और हम वर्ष 2030 तक शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकते हैं. हालांकि जब रक्षा बजट की बात आती है, तो हम हमारे देश की सुरक्षा ज़रूरतों को बमुश्किल भी पूरा नहीं कर पाते हैं. जब प्रति व्यक्ति रक्षा बजट की बात आती है, तो आज हम हम वैश्विक औसत से बहुत पीछे हैं और एशिया में नीचे से चौथे स्थान पर हैं. यदि हम रक्षा पेंशन अलग रखें तो तो वर्ष 2020-21 में प्रतिरक्षा के लिए हमारा बजट आवंटन लगभग 3.37 लाख करोड़ रुपये था जो हमारे जीडीपी के 1.5% से भी कम है. हैरानी की बात है कि यह पिछले साल के रक्षा बजट के मुकाबले सिर्फ 2% अधिक था. भारत के रणनीतिक महत्त्व और हमारे सुरक्षा ज़रूरतों को देखते हुए ये पूरी तरह अपर्याप्त है.Also Read - चीनी सेना PLA ने इंडियन आर्मी को सौंपा अरुणाचल प्रदेश के 19 साल के लड़के को: केंद्रीय मंत्री रिजिजू का ट्वीट

आने वाले वर्ष हमारे देश की रक्षा के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण होने वाले हैं. सुरक्षा बलों का पुनर्गठन, उनका आधुनिकीकरण, नए साज़ो सामान की खरीद और प्रशिक्षण एक प्रमुख कार्य है जिसके लिए काफी धन की आवश्यकता होगी. गलवान और डोकलाम जैसी घटनाओं से संकेत मिलता है कि भारत को बहु-आयामी युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए और भारत की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इसके लिए धन की भी आवश्यकता होगी. आइए हम अपनी रक्षा तैयारियों का विश्लेषण करें और पता करें कि रक्षा बजट 2021-22 से हम क्या-क्या उम्मीद करते हैं. Also Read - Indian Army, असम राइफल्स के पांच जवान मरणोप्रांत और एक सेवारत जवान शौर्य चक्र से सम्मानित

1. भारतीय वायु सेना के लिए लड़ाकू विमानों की खरीद – भारतीय वायुसेना काफी समय से अपनी तय क्षमता से कम स्क्वाड्रनों के साथ काम कर रही है. जहाँ एक तरफ चीन और पाकिस्तान, दोनों खतरे मुंह बाये खड़े हैं, हमारे लड़ाकू विमानों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. भारतीय वायुसेना ने 126 मध्यम-बहुउद्देशीय विमानों की ज़रुरत आज से बीस वर्ष पूर्व 2001 में दी थी पर लगातार पूर्ववर्ती सरकारों की उदासीनता और लालफीताशाही की वजह से हम केवल 36 राफेल जहाज़ ही आर्डर कर पाए. एक बार फिर, 114 एमआरसीए की आवश्यकता वायु सेना ने दी है जिसको बहुत Also Read - Republic Day 2022: टाइमिंग से लेकर मोटरसाइकिल के हैरतअंगेज फॉर्मेशन तक, जानें इस बार की परेड में क्या कुछ होगा खास

ही तेज़ी के साथ पूरा किया जाने की आवश्यकता है. इसके अलावा, वर्तमान उपकरणों का स्वदेशीकरण भी एक चिंता का विषय है और इसलिए तेजस मार्क II और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान का विकास हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है. इन सब महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए काफी धन की आवश्यकता होगी और इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा वर्ष 2021 -22 के बजट में मंज़ूर करना हमारे लिए ज़रूरी है.एक अनुमान के मुताबिक इसके लिए लगभग 38,000 करोड़ रुपयों की ज़रुरत होगी.

2. लड़ाकू हेलीकॉप्टर- आज भारत का लड़ाकू हेलीकॉप्टरों का बेडा संसार की प्रमुख शक्तियों में सबसे छोटा है. हाल ही में अमरीका से अपाचे हेलीकाप्टर प्राप्त करने के बाद भी, हम इस दिशा में बहुत पीछे हैं. इसका सबसे बड़ा समाधान है स्वयं का लड़ाकू हेलीकाप्टर विकसित करना. भारत में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड ने अपना हल्का लड़ाकू हेलीकॉप्टर (रुद्र) विकसित किया है जो एक अच्छा लड़ाकू हेलीकाप्टर है और सभी अत्याधुनिक सुविधाओं और हथियारों से लैस है. यही नहीं इसमें उच्च स्तर का स्वदेशीकरण भी है जो भारत की विदेशों पर निर्भरता को कम करेगा. इन हेलीकॉप्टरों के विकास और खरीद के लिए भी लगभग 5,000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी.

3. ड्रोन- जैसा कि हम जानते हैं कि भविष्य के युद्ध ड्रोन का उपयोग करके ही लड़े जाएंगे. हमने हाल ही में हुए नागॉर्नो-करबाख युद्ध में भी ऐसा ही देखा है. अभी तक भारत ने अपना कोई विश्वसनीय ड्रोन विकसित नहीं किया है और हम इजरायल से खरीदे गए कुछ निगरानी करने वाले ड्रोन्स पर निर्भर है. यही नहीं, हमला करने वाले ड्रोन के क्षेत्र में हमारी प्रगति बहुत अधिक नहीं है जो कि एक आपातकालीन ज़रुरत है. जिस तरह से चीन पाकिस्तान को निगरानी और हमला करने वाले दोनों तरह के ड्रोन्स मुहैया करा रहा है, हमारी चिंता बहुत बढ़ गयी है और आज भारत को दोनों दिशाओं में मज़बूत कदम उठाने पड़ेंगे. जहाँ सबसे पहले हमें अपनी सुरक्षा के लिए हमलावर ड्रोन खरीदने पड़ेंगे वहीँ साथ ही खुद की तकनीक विकसित करके भविष्य के लिए अपनी प्रतिरक्षा को मज़बूत करना होगा जिसके लिए इस वित्त वर्ष में कम से कम 10,000 करोड़ रुपयों की आवश्यकता पड़ेगी.

4. आर्टिलरी गन्स, रॉकेट्स एंड मिसाइल्स- हमारे देश में तोपों की आखिरी बड़ी खरीद अस्सी के दशक में हुई थी जब हमने बोफोर्स से 155 मिली मीटर की हॉवित्जर तोपें

खरीदी थी. इस खरीद पर बाद में बहुत बड़ा हंगामा हुआ और लगभग चालीस वर्ष बाद भी आज तक हम अपने तोपखाने का आधुनिकीकरण नहीं कर पाए हैं. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में रॉकेटों की मामूली खरीद की गई थी, लेकिन आज भी हमारा तोपखाना पुराने उपकरणों पर निर्भर है और हमें इसे तत्काल बदलने की आवश्यकता है. वर्तमान परिदृश्य में, हमें उच्च कैलिबर के रॉकेट, स्वचालित तोपें और अन्य हथियारों की आवश्यकता है. इसके अतिरिक्त मिसाइल प्रणालियाँ जो रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं को और विकसित करना पड़ेगा. हमारे पास पहले से ही ब्रह्मोस, अग्नि और पृथ्वी जैसी प्रणालियाँ हैं पर चीन के खतरे को देखते हुए हम तकनीकी रूप से अभी काफी पीछे हैं . तोपखाने के पुनर्गठन, आधुनिकीकरण और विकास के लिए कम से कम 10,000 करोड़ और चाहिए.

5. भारतीय वायु सेना के परिवहन बेड़े- भविष्य के युद्ध बहु आयामी होगा और ऐसे समय में हमारी वायु सेना के परिवहन बेड़े को भी बदलने की आवश्यकता है. ऐसा इसीलिए चाहिए ताकि हम अपनी सेनाओं को जल्दी से जल्दी दूर दराज़ के इलाक़ों में पहुंचा सकें. आज हमारी वायुसेना में पुराने एंटोनोव और एवरो जैसे जहाज़ में जिनको जल्द ही बदलने की आवश्यकता है और इसके लिए स्वाभाविक रूप से धन की आवश्यकता है. भारत एयरबस के साथ एक करार की और बढ़ रहा है जिसके तहत 56 नए जहाज़ खरीदे जायेंगे और उनके लिए लगभग 18,000 करोड़ चाहिए .

6. भारतीय नौसेना का पनडुब्बी कार्यक्रम- यदि हम अपने विशाल समुद्री सीमा को देखते हैं, तो हम अपने मौजूदा पनडुब्बी बेड़े के चलते इसकी सुरक्षा करने में काफी पीछे हैं.

आज भी हमारे पास पुरानी किलो क्लास पनडुब्बियां हैं और नयी पनडुब्बियों के विकास बहुत धीरे चल रहा है. एक प्रभावी परमाणु क्षमता के लिए भी एक मज़बूत समुद्री बेड़ा चाहिए. एक अनुमान के मुताबिक सटीक जवाबी कार्रवाई करने के लिए, भारत को अगले दशक में अपने पनडुब्बी बेड़े को तीन गुना करने की आवश्यकता है. स्कॉर्पीन पनडुब्बियां बन रही है पर हमें ऐसी कम से कम चार और चाहिए , वहीँ परमाणु चलित पनडुब्बियों के बेड़े में हमें कम से कम आठ पनडुब्बियां चाहिए जबकि केवल दो ही नौसेना में अभी तक शामिल हो पायी हैं. अगले कुछ वर्षों में इस ओर लगभग 20000 करोड़ के निवेश की ज़रुरत है और ये प्रक्रिया इस वित्त वर्ष में ही शुरू होनी चाहिए. हम इस पर और देर नहीं कर सकते.

7. संचार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के उपकरण – वर्तमान परिदृश्य में जहाँ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पहलू है, हम अपने विरोधियों विशेषतः चीन के मुकाबले बहुत पीछे हैं. जहाँ विश्व की प्रमुख ताकतें बहुआयामी डेटा-लिंक-आधारित संचार मैट्रिक्स में काम कर रहे हैं, हम कहीं नहीं ठहरते. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में काम आने वाले उपकरणों की खरीद और इस तकनीक को देश में विकसित करने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है. भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड काफी समय से इस दिशा में काम कर रहा है परन्तु सरकार को इसके लिए और अधिक बजट आवंटित करना पड़ेगा ताकि हम अपने विकास की रफ़्तार को बनाये रखें.

8. एयर डिफेंस एवं एंटी मिसाइल सिस्टम- भारत उन कुछ देशों में से एक है जो अभी भी दूसरे विश्व युद्ध की एयर डिफेंस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं. पाँच दशकों से अधिक समय तक हमारे राजनेताओं का ध्यान कभी इस तरफ नहीं गया. भारत की एयर डिफेन्स और एंटी मिसाइल डिफेन्स में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है. भारत ने अभी अभी रूस से एस -400 प्रणाली के आर्डर दिया है परन्तु हमें अभी लम्बी और मध्यम दूरी के प्रणालियों की और ज़रूरत है. पुराने सिस्टम लड़ाई के काबिल नहीं बचे हैं और नए उपकरणों की खरीद, अपने स्वदेशी उपकरणों का विकास, हमारे निगरानी ग्रिड, संचार नेटवर्क और कमांड और रिपोर्टिंग चैनलों को विकसित करने के लिए भारी मात्रा में धन की आवश्यकता है. उम्मीद है हमारे वित्त मंत्री इस और ध्यान देंगे.

9. नौसेना का आधुनिकीकरण – आज के परिदृश्य में, जो देश सागरों पर नियंत्रण रखता है, वो समूचे विश्व पर नियंत्रण रखता है. इसके चलते एक सशक्त नौसेना अभियान बल होना बहुत जरूरी है. इसलिए भारतीय नौसेना को नए युद्धपोतों, पनडुब्बी रोधी जहाज़ों, माइनस्वीपर जहाजों और बड़े बैटल क्रूजरों की आवश्यकता है. जिस तरह से चीन ने दक्षिण चीन सागर पर कब्जा कर लिया है और हिंद महासागर में हमें अपनी आँखें दिखा रहा है , यह हमारी बहुत बड़ी प्राथमिकता बन जाती है. युद्धपोतों के निर्माण को तेज़ करने के लिए जहाँ सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों की क्षमता बढ़ानी पड़ेगी वहीं निजी क्षेत्र को भी इसमें शामिल करना पड़ेगा.

10. युद्धक बलों का एकीकरण- लड़ाई का स्वरुप बदल रहा है और आज के परिप्रेक्ष्य में थलसेना, वायुसेना, नौसेना और अन्य आयामों को मिलकर युद्ध लड़ने की आवश्यकता है. हमारी रणनीति भी बदल रही है और भविष्य की लड़ाई स्वतंत्र युद्धक समूहों द्वारा लड़ी जाएगी जिसमें सारे अंग एकीकृत होंगे. स्वाभाविक रूप से न केवल इसके लिए उन्नत उपकरण चाहिए बल्कि प्रशिक्षण और अन्य मदों में भी धन की आवश्यकता होगी और इसे बजट में शामिल करने की आवश्यकता है.

संक्षेप में, यदि हम पूरे लेख को समाहित करें तो ये पता चलता है कि हमारे सुरक्षा बलों की आपातकालीन और तात्कालिक आवश्यकताओं की ही पूर्ति के लिए बजट में महत्वपूर्ण वृद्धि की आवश्यकता है. सिर्फ नए हथियारों और उपकरणों की खरीद के लिए 4 लाख करोड़ से अधिक की आवश्यकता है, जबकि अनुसंधान और विकास के लिए एक लाख करोड़ की अतिरिक्त आवश्यकता है. यदि हम बाकि खर्चों को भी जोड़ लें तो प्रतिरक्षा बजट 2021 -22 में, भारत को कम से कम 6-7 लाख करोड़ रुपये के आवंटन की आवश्यकता है.

हमारे नेताओं को एक चुनाव करना होगा – उन्हें मुफ्त की सुविधाएं अपनी जनता को देनी हैं या फिर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी हैं. दरियादिली या राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच एक चीज़ को चुनना होगा . पिछली सरकारें लगातार सुरक्षा जरूरतों की अनदेखी करती रही हैं जिससे गंभीर नुकसान हो चुका है. याद रखें- हम समृद्धि के बारे में तभी सोच सकते हैं जब हम सुरक्षित हों.