डिवोर्स केस में कैसे तय होती है बच्चे की कस्टडी, कोर्ट किन पॉइंट पर करता है फैसला, हर मां-बाप को जाननी चाहिए ये 10 बातें

Child Custody Law: शादी के बाद महिला अगर प्रेग्नेंट है. उस दौरान पति-पत्नी के बीच अनबन हो गई. घर का झगड़ा कोर्ट में जा पहुंचा और तलाक लेने की नौबत आ गई, तब सबसे पहला सवाल उठता है कि इस केस में होने वाले बच्चे की कस्टडी किसके पास रहेगी? या फिर बच्चे के भविष्य का क्या होगा? आइए जानते हैं डिवोर्स केस में बच्चे की कस्टडी को लेकर क्या कहता है कानून:-

Published date india.com Published: October 13, 2025 4:47 PM IST
डिवोर्स केस में कैसे तय होती है बच्चे की कस्टडी, कोर्ट किन पॉइंट पर करता है फैसला, हर मां-बाप को जाननी चाहिए ये 10 बातें
हिंदू मैरिज एक्ट (1955) का सेक्शन 26 कोर्ट को चाइल्ड की कस्टडी से जुड़े फैसले लेने की शक्ति देता है.

भारत में शादी दो लोगों के बीच का नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच का संबंध होता है. शादी किसी के भी जिंदगी का सबसे खास पल होता है. अगर इसे अच्छे से निभाया जाए, तो इसके आधार पर बाकी जिंदगी की एक खूबसूरत कहानी लिखी जा सकती है. लेकिन, रिश्ते को संभालने की जिम्मेदारी जितनी पत्नी की होती है उतनी ही पति की भी. जब तक दोनों मिलकर इस जिम्मेदारी को नहीं निभाएंगे तब तक ये रिश्ता आगे नहीं बढ़ सकता है. आजकल इंडिविचुअलिटी और हद से ज्यादा एंबिशन कहीं न कहीं रिश्ते टूटने की वजह बन रहे हैं. बेडरूम से शुरू हुई कहासुनी एक समय बाद कोर्ट रूम तक जा पहुंचती है. जब तलाक होता है, तब सिर्फ पति-पत्नी ही अलग नहीं होते, बल्कि उनके साथ दो परिवार भी अलग हो जाते हैं. अगर इस शादी से बच्चे होते हैं, तो उन्हें में मां या पापा में किसी एक को मजबूरन चुनना पड़ जाता है.

शादी के बाद महिला अगर प्रेग्नेंट है. उस दौरान पति-पत्नी के बीच अनबन हो गई. घर का झगड़ा कोर्ट में जा पहुंचा और तलाक लेने की नौबत आ गई, तब सबसे पहला सवाल उठता है कि इस केस में होने वाले बच्चे की कस्टडी किसके पास रहेगी? या फिर बच्चे के भविष्य का क्या होगा? हिंदू मैरिज एक्ट में जैसे शादी करने और तलाक लेने के नियम हैं. वैसे तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी किसे और कैसे मिलेगी, इसे लेकर भी नियम तय हैं. आइए जानते हैं डिवोर्स केस में बच्चे की कस्टडी को लेकर क्या कहता है कानून:-

बच्चों की कस्टडी होती क्या है?
भारत में 18 साल से कम उम्र के बच्चे की कानूनी गार्जियनशिप को बच्चे की कस्टडी कहा जाता है. यानी माता-पिता के तलाक के बाद कानून इस बात का फैसला करता है कि बच्चे की देखभाल बेहतर तरीके से कौन कर पाएगा? बच्चा किसके पास अच्छे तरीके से पल पाएगा? कोर्ट जिस पूरे प्रोसेस में ये फैसला करता है, उसे चाइल्ड कस्टडी कहते हैं.

भारत में किस कानून पर तय होती है चाइल्ड कस्टडी?

भारत में हिंदू बच्चों की कस्टडी के लिए 3 कानून हैं:-

Add India.com as a Preferred SourceAdd India.com as a Preferred Source
  • हिंदू मैरिज एक्ट (1955) सेक्शन 26: इसके जरिए कोर्ट को चाइल्ड की कस्टडी से जुड़े फैसले लेने की शक्ति देता है.
  • हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट 1956: इसके तहत 5 साल से कम उम्र के बच्चों की कस्टडी तय होती है. 90% ऐसे मामलों में बच्चे की कस्टडी मां को ही मिलती है.
  • गार्जियन एंड वार्ड एक्ट 1890: इस कानून के जरिए बच्चे की गार्जियनशिप और प्रॉपर्टी राइट्स तय होते हैं.

इन तीन कानूनों के आधार पर कोर्ट किसी बच्चे की कस्टडी तय करता है. हालांकि, बच्चे की कस्टडी किसे मिलेगी ये केस टू केस डिपेंड करता है.

कोर्ट 5 पॉइंट पर तय करता है चाइल्ड कस्टडी का फैसला

1.फिजिकल कस्टडी: इसमें कोर्ट माता-पिता दोनों में से किसी एक को प्राइमरी गार्जियन बनाता है. दूसरे पेरेंट को बच्चे से मिलने के लिए एक डेट अलॉट कर दिया जाता है. बाकी दिनों में बच्चे को दूसरे पेरेंट से मिलने की परमिशन नहीं होती है.

2.जॉइंट कस्टडी: इसमें तलाक के बाद भी मां-बाप दोनों को बच्चे की जॉइंट कस्टडी मिलती है. दोनों रोटेशन बेसिस पर बच्चे के भविष्य की प्लानिंग कर सकते हैं. इसमें बच्चा एक निश्चित समय के लिए बारी-बारी से माता और पिता दोनों के पास रहता है.

3.लीगल कस्टडी: लीगल कस्टडी में मां-बाप में कोई एक पक्ष कानूनी तौर पर बच्चे की जिंदगी से जुड़े हुए सभी अहम फैसले ले सकता है. इस तरह के केस में जिसे लीगल कस्टडी मिली हो, वो बच्चे के 18 साल की उम्र न होने तक उसके एजुकेशन, फाइनेंस, धर्म और मेडिकल जरूरतों के बारे में फैसले ले सकता है.

4. सोल चाइल्ड कस्टडी: जब बच्चे की मां या पिता में कोई एक मेडिकली फिट नहीं होते हैं, तब बच्चे की कस्टडी किसी एक पक्ष को दे दी जाती है. अगर बच्चों को किसी एक पेरेंट यानी मां या पिता से कोई खतरा है तब कोर्ट दूसरे पक्ष को बच्चे की पूरी कस्टडी दे देती है.

5. थर्ड पार्टी कस्टडी: ऐसा तब होता है बच्चे की मां और पापा दोनों की मौत हो जाए या फिर दोनों की दिमागी हालत ठीक न हो. अगर मां या पिता में कोई भी बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता, तब भी कोर्ट थर्ड पार्टी को बच्चे की कस्टडी दे सकता है. थर्ड पार्टी कस्टडी ज्यादातर नाना-नानी या दादा-दादी को ही मिलती है. कुछ एक केस में ये कस्टडी अनाथाश्रम या ट्रस्ट को भी दी जा सकती है.

बच्चों की कस्टडी देने का प्रोसेस क्या है?

  • इसके लिए हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट 1956 को ज्यादातर मामलों में आधार बनाया गया है. इसके तहत अगर बच्चे की उम्र 5 साल से कम है, तब कस्टडी मां को दी जाएगी.
  • उम्र 9 साल से ज्यादा है, तो कोर्ट बच्चे से उसकी मर्जी पूछेगा कि वह किसके साथ रहना पसंद करेगा. इसके बाद कोर्ट अपना फैसला सुनाता है.
  • अगर बेटा बड़ा है, तो ऐसे केस में अक्सर बच्चे की कस्टडी उसके पिता को मिलती है.
  • बेटी के मामले में कस्टडी अक्सर मां को मिलती है. कुछ केस में लड़की की कस्टडी उसके पिता को भी मिल सकती है.
  • अगर दोनों पति और पत्नी जॉब करते हैं इस स्थिति में दोनों का बराबरी से बच्चे पर अधिकार कोर्ट से दिया जा सकता है.

म्यूचुअल डिवोर्स केस में किसे मिलती है बच्चे की कस्टडी?

म्यूचुअल डिवोर्स केस में बच्चे की कस्टडी देने के लिए स्पेशल क्राइटेरिया बने हुए हैं. जब कोर्ट को लगता है कि इस क्राइटेरिया पर मां या बाप में कोई एक फिट बैठता है, तब कोर्ट उसी पेरेंट को बच्चे की कस्टडी देती है. ऐसे केस में कोर्ट ये भी देखता है कि मां या बाप में कौन बच्चे को एक अच्छी लाइफ दे सकता है. इसके लिए लाइफस्टाइल, फैमिली बैकग्राउंड, एजुकेशन और इनकम देखा जाता है. इस बात को भी नोट किया जाता है कि बच्चे की पर्सनैलिटी डेवलपमेंट इस समय किसकी ज्यादा जरूरत है- मां या पिता की.

मां के बजाय पिता को कब मिलती है बच्चे की कस्टडी?

कुछ खास परिस्थितियों में कोर्ट मां के बजाय पिता को बच्चे की कस्टडी देता है:-

  • अगर मां का किसी और से अफेयर्स है.
  • बच्चे की मां घर छोड़कर चली गई हो.
  • मानसिक तौर पर बीमार हो या मेंटल हो.
  • अगर मां निर्दयी हो. उसके क्रुएलटी के सबूत होने चाहिए.
  • अगर कोर्ट को लगे कि मां के बजाय पिता बच्चे की देखभाल बेहतर तरीके से कर सकता है.
  • अगर खुद मां अपने बच्चे की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दे.

अगर मां बच्चे की परवरिश ढंग से नहीं कर पा रही, तब पिता के पास क्या रास्ते हैं?
ऐसे में पिता को कोर्ट में यह साबित करना होगा की बच्चा अभी मां की कस्टडी में है, लेकिन उसकी जिंदगी के लिए ये सही नहीं है. इस केस में पिता को साबित करना होगा कि बच्चे का मां के पास रहना क्यों ठीक नहीं है. पिता को ये भी साबित करना होता है कि बच्चे का मानसिक विकास बिगड़ रहा है. इसके बाद बच्चे की कस्टडी का क्लेम लगाकर कोर्ट से आदेश लिया जा सकता है.

अगर कस्टडी पाने वाला पेरेंट दूसरे पेरेंट को बच्चे से मिलने न दे तो?
फिजिकल चाइल्ड कस्टडी के मामलों में आमतौर पर फैमिली कोर्ट से डायरेक्शनल आर्डर मिलता है कि बच्चे से मिलने का जो समय और जगह तय हुई है उससे फॉलो किया जाए. इसके बाद भी मां कोर्ट का आदेश फॉलो न करे, तब पिता कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट का केस उस पर कर सकता है. इसके बाद पुलिस की मौजूदगी में बच्चे से मिलने का अधिकार पिता को मिलेगा.

पिता की मौत हो जाए और मां को कस्टडी न मिले तो?
इस केस में मां पुलिस या कोर्ट के माध्यम से बच्चे की कस्टडी ले सकती है. कानूनन एक बच्चे की कस्टडी का पहला अधिकार मां या पिता का ही है.

एडल्ट बेटा या बेटी के ऐसे केस में क्या अधिकार होते हैं?
डिवोर्स के केस में एक एडल्ट बेटा या बेटी खुद तय कर सकते हैं कि वो मां या पिता में से किसके साथ रहना चाहते हैं. अगर वो दोनों में से किसी के पास नहीं रहना चाहते, तो खुद अकेले रहने का ऑप्शन चुन सकते हैं. या फिर कुछ खास मामलों में थर्ड पार्टी (नाना-नानी या दादा-दादी) के पास रह सकते हैं.

Also Read:

ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें Business Hindi की और अन्य ताजा-तरीन खबरें

By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts Cookies Policy.