नई दिल्ली. वर्ष 2008 में टाटा मोटर्स के चेयरमैन रतन टाटा ने ऑटो एक्सपो में अपने ड्रीम प्रोजेक्ट, 1 लाख रुपए की कार, नैनो से दुनिया को रूबरू कराया था. वादे के मुताबिक 2009 में कंपनी ने इस बहुचर्चित और बहुप्रचारित कार को भारत की सड़कों पर उतार दिया. ‘लखटकिया कार’ के रूप में जानी-पहचानी गई यह कार, भारत के उन मध्यवर्गीय परिवारों के लिए आदर्श थी जो दोपहिया वाहनों में चलते हुए कार का सपना देखा करते थे. रतन टाटा ने भारत के इन करोड़ों परिवारों के सपने को साकार कर दिया था. लेकिन महज 10 वर्षों के सफर के बाद ही टाटा नैनो अब अपने अंतिम दिन गिनने लगी है. टाटा मोटर्स की छोटी कार नैनो की यात्रा अब समाप्त होती नजर आ रही है. क्योंकि बीते जून महीने में केवल एक नैनो कार बनी. हालांकि कंपनी का कहना है कि नैनो का उत्पादन रोकने के बारे अभी कोई औपचारिक फैसला नहीं किया गया है. Also Read - Kerala Pregnant Elephant Murder: केरल में प्रेग्नेंट हथिनी की हत्या पर बोले उद्योगपति रतन टाटा- 'दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो'

1 महीने में बिकी सिर्फ 3 कार
रतन टाटा का सपना कही जाने वाली नैनो कार का उत्पादन पिछले कुछ वर्षों में लगातार घट रहा है. हालत यहां तक पहुंच गई है कि घरेलू बाजार में बीते महीने में केवल तीन गाड़ियां ही बिकी हैं. वहीं जून में कंपनी ने एक भी नैनो कार विदेश नहीं भेजी, यानी निर्यात भी नहीं हुआ. टाटा मोटर्स ने शेयर बाजारों को आधिकारिक रूप से सूचित किया है कि जून महीने में उसने नैनो का कोई निर्यात नहीं किया. जून 2018 में केवल एक नैनो बनी, जबकि जून 2017 में यह संख्या 275 रही थी. इस कार के बिकने का अनुपात भी पिछले वर्ष के मुकाबले 2018 में कम हो गया है. कंपनी के अनुसार इस वर्ष जून में जहीं तीन नैनो बिकी, वहीं एक साल पहले यह संख्या 167 रही थी. Also Read - Coronavirus के बीच रतन टाटा ने उद्यमों को सक्षम बनाने के लिए कही ये बात, जताई ये उम्‍मीद

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नैनो के सफर में शुरू से ही रोड़े
टाटा नैनो के सफर की शुरुआत ही बाधाओं से हुई है. पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा नैनो के प्लांट की स्थापना को लेकर हुए आंदोलन के कारण फैक्ट्री की जगह बदलनी पड़ी. उत्पादन की लागत कम करने का पहला प्रयास ही सफल नहीं हुआ. आखिरकार गुजरात के साणंद में टाटा मोटर्स को अपने चेयरमैन की ‘ब्रेनचाइल्ड’ कही जाने वाली नैनो कार की फैक्ट्री के लिए जगह मिली. यहां से कार का उत्पादन शुरू हुआ. वादे के मुताबिक रतन टाटा ने 2009 में लॉन्च करने के बाद शुरुआती दौर के ग्राहकों को सिर्फ 1 लाख रुपए में नैनो कार बेची. बाद में हालांकि इसकी कीमत बढ़ा दी गई. तब भी इसने छोटी कारों की श्रेणी में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई. लेकिन सड़कों पर उतरी नैनो में कई जगह आग लगने की घटनाओं के बाद इसकी लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आई.

कार की ब्रांडिंग न करने की गलती
रतन टाटा ने जिस तरह भारत के निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए कार का सपना साकार करने की बात कही थी, कंपनी ने इसे पूरा भी किया. लॉन्च होने के बाद लाखों परिवारों ने कार खरीदी भी, लेकिन यह आम आदमी की कार नहीं बन सकी. खुद रतन टाटा ने भी नैनो की लॉन्चिंग के बाद माना था कि नैनो की ब्रांडिंग और उसका प्रमोशन ‘सबसे सस्ती कार’ के रूप में नहीं किया जा सका. यह गलती थी. रतन टाटा ने नैनो के प्रसार में इसे बड़ी नाकामी कहा था. इसलिए बड़ी लोकप्रियता बटोरने के बाद भी नैनो की वजह से टाटा मोटर्स को लगातार घाटा उठाना पड़ा. कंपनी के अनुसार टाटा मोटर्स के चेयरमैन साइरस मिस्त्री के कार्यकाल के दौरान टाटा नैनो का घाटा लगभग 1 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया था. नैनो के उत्पादन में हुए इस नुकसान से कंपनी कभी उबर नहीं सकी.

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…तो क्या बंद हो जाएगा नैनो का उत्पादन
2017 के जून में 200 कारें न बेच पाना और अब 2018 के जून में कंपनी की फैक्ट्री से महज 1 कार का उत्पादन, यह संकेत है कि ‘लखटकिया कार’ नैनो का उत्पादन बंद होने वाला है. टाटा मोटर्स ने हालांकि आधिकारिक रूप से इस कार का उत्पादन बंद करने की घोषणा नहीं की है. नैनो का निर्माण रोके जाने संबंधी सवाल पर टाटा मोटर्स के प्रवक्ता भी कुछ ऐसा ही जवाब देते हैं. नैनो का निर्माण रोकने को लेकर पूछे जाने पर टाटा मोटर्स के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘हम जानते हैं कि मौजूदा प्रारूप में नैनो 2019 के बाद जारी नहीं रह सकती. हमें नए निवेश की जरूरत हो सकती है. इस संबंध में अभी कोई फैसला नहीं किया गया है.’ हालांकि उन्होंने कहा कि ग्राहकों की मांग को देखते हुए हम प्रमुख बाजारों में नैनो का उत्पादन जारी रखेंगे.

(इनपुट – एजेंसी)