नई दिल्ली: क्यूं हर दिन बढ़ रहे हैं पेट्रोल और डीजल के दाम?, राजनीतिक रूप से संवेदनशील और आम आदमी से जुड़े इस मसले की गंभीरता को देखते हुए भी सरकार इस मामले में हस्तक्षेप को लेकर पशोपेश में क्यूं है और निकट भविष्य में इससे राहत की क्या कोई उम्मीद है, यह कुछ ऐसे सवाल हैं, जो आज पूरे देश के लोगों को परेशान कर रहे हैं. सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते पेट्रोल के दाम दिल्ली में 78 रुपए प्रति लीटर से ऊपर और डीजल 69 रुपए से अधिक हैं. बढ़ती महंगाई की आंच लोगों को झुलसाने लगी है. ईंधन के दामों में वृद्धि से जुड़़े विभिन्न पहलुओं के बारे में पेश है सार्वजनिक क्षेत्र की आयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) के पूर्व चेयरमैन और प्रबंध निदेशक (सीएमडी) आरएस शर्मा से 5 सवाल और उनसे मिले जवाब… Also Read - सरकारी कर्मचारियों के लिए खुशखबरी, केंद्र की तर्ज पर अब योगी सरकार देगी त्योहारी एडवांस

सवाल 1. पेट्रोल और डीजल के दाम में हाल में आई तेजी के क्या कारण हैं?
जवाब- इसका कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में वृद्धि है. यह वृद्धि मांग और आपूर्ति में अंतर और धारणा से प्रभावित होती है. अमेरिका के ईरान के साथ परमाणु समझौते से हटने तथा फिर से पाबंदी लगाने और वेनेजुएला में संकट से आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है और इसीलिए घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ी. इसके अलावा तेल निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) के सदस्य देश अपने हितों के आधार पर कच्चे तेल का दाम 80 डालर से अधिक रखना चाहते हैं और इसी के आधार पर आपूर्ति निर्धारित कर रहे हैं. Also Read - कोरोना के साथ-साथ अन्य मौसमी बीमारियों को कैसे रखें दूर? सरकार ने जारी किए दिशा-निर्देश

सवाल 2. सरकार ने जब ईंधन के दाम को नियंत्रण मुक्त कर दिया है, तो कर्नाटक चुनाव के दौरान लगभग 20 दिन तक मूल्य क्यों नहीं बढ़ाए गयए? Also Read - Cinema Hall Opening News in UP: सिनेमा हॉल और मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्म देखने के लिए हो जाइए तैयार, शर्तों के साथ सरकार ने दी अनुमति

जवाब– ये बातें सब समझते हैं. इसमें कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है. आम लोगों को भी यह पता है कि चुनावों के समय सरकार चाहती है कि उसके पक्ष में धारणा हो, चीजें अच्छी दिखें और इसको ध्यान में रखकर तेल के दाम नहीं बढ़ाए जाते हैं.

सवाल 3. तेल कंपनियां किस आधार पर कीमत का निर्धारण करती हैं? हाल में कच्चे तेल के दाम 4-5 डालर घटने के बावजूद पेट्रोल, डीजल के दाम में मात्र एक पैसा, पांच पैसा की कटौती की गई?

जवाब- पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम के आधार पर तय होती हैं. जहां तक इसमें कमी का सवाल है, यह एक-दो दिन के लिए ही हुई है. कच्चे तेल के दाम में फिर तेजी देखी जा रही है. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अप्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक कंपनियों पर राजनीतिक प्रभाव रहता है. वैसे भी कंपनियों पर जिसका स्वामित्व होता है, उसके हिसाब से निर्णय होते हैं. यह बात हर जगह लागू है. प्रबंधन को अपने हित में जो उपयुक्त लगता है, कंपनियां वही काम करती हैं. दूसरा, हम अपनी कुल तेल जरूरतों का 80 प्रतिशत आयात करते हैं और इस पर कर लगाना और उसकी वसूली सबसे ज्यादा आसान है. यह सरकार के राजस्व का बढ़िया स्रोत है.

सवाल 4. पेट्रोल, डीजल के दाम में वृद्धि निरंतर एक मसला बना हुआ है. इसका दीर्घकालीन हल क्या है? क्या जीएसटी के दायरे में लाने से राहत मिलेगी?

जवाब- इस बारे में विजय केलकर की अध्यक्षता वाली समिति ने उत्पादन बढ़ाने एवं विभिन्न स्तर पर सुधारों को लेकर कई सिफारिशें की हैं. उन सिफारिशों को लागू करने की जरूरत है. दूसरी बात, जब आपने ईंधन के दाम में नियंत्रण मुक्त करने का निर्णय किया तो इस फैसले का सम्मान होना चाहिए. जब कच्चे तेल के दाम घट रहे थे, फिर आपने उत्पाद शुल्क क्यों बढ़ाये? तेल के दाम कम हो रहे थे तो इसका लाभ ग्राहकों को देना चाहिए था. साल 2014 में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 9 रुपए के करीब था, जिसे बढ़ाकर 19 रुपए से अधिक कर दिया गया (पेट्रोल पर जून 2014 में उत्पाद शुल्क 9.48 रुपए और अक्टूबर 2017 से 19.48 रुपए, डीजल पर 3.56 रुपए और अक्टूबर 2017 से 15.33 रुपए) जबकि उस समय तेल के दाम घट रहे थे.

अगर आपने उस समय वह लाभ दिया होता, तो अभी इतना हो-हल्ला नहीं मचता. पर कर राजस्व बढ़ाने तथा राजकोषीय स्थिति में सुधार के लिए ऐसा नहीं किया गया. सरकार को उत्पाद शुल्क में कटौती करनी चाहिए. इससे मूल्य वर्द्धित कर (वैट) भी कम होगा और दाम कम होंगे और ग्राहकों का राहत मिलेगी. दूसरा कोई उपाय नहीं है, क्योंकि फिलहाल इंटरनेशनल मार्केट में दाम में नरमी के कोई संकेत नहीं दिखते.

जहां तक जीएसटी का सवाल है, फिलहाल इसके तहत अधिकतम कर 28 प्रतिशत है जबकि पेट्रोल डीजल पर कर 100 प्रतिशत (उत्पाद शुल्क और स्थानीय कर या वैट मिलाकर) से भी अधिक है. उनके लिए (केंद्र एवं राज्य सरकार) पेट्रोलियम उत्पादों को फिलहाल जीएसटी के दायरे में लाना मुश्कल है, क्योंकि इससे उनका राजस्व प्रभावित होगा.

सवाल 5. आईओसी, आयल इंडिया जैसी कंपनियों का मुनाफा काफी बढ़ा है. क्या तेल कंपनियों को कुछ सब्सिडी वहन नहीं करनी चाहिए?

जवाब- ये कंपनियां काफी बड़ी हैं. इनका जितना कारोबार है, उसमें 20,000 करोड़ रुपए का सालाना मुनाफा कोई ज्यादा नहीं है. फिर इन्हें नई परियोजनाओं और विदेशों में भी निवेश करना होता है जो जरूरी है. उसके लिये पूंजी चाहिए. ये कंपनियां बेहतर काम कर रही हैं. इन पर आप कितना भार डालेंगे? (इनपुट- एजेंसी)