Explained: दूसरी कोविड लहर के बाद अप्रत्याशित रूप से विकास में बाधा पहुंचने के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था में लगातार सुधार हो रहा है. कोविड -19 स्थिति में सुधार के कारण प्रतिबंध हटाए जाने के बाद आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है. साथ ही कंपनियों ने भी बढ़ती मांग के साथ उत्पादन को बढ़ाया है. जिससे जानकारों का मानना है कि इस साल के अंत तक अर्थव्यवस्था में मजबूती आएगी. हालांकि, उच्च मुद्रा स्फीति अभी भी एक रोड़ा बन रही है. इसकी वजह से विकास तो प्रभावित ही हो रहा है. साथ ही शेयर बाजार पर भी इसका नकारात्मक असर बना हुआ है.Also Read - Indian Economy: वित्त वर्ष 2021-22 में 9.5% से ज्यादा तेजी से बढ़ सकती है भारत की अर्तव्यवस्था: एसबीआई रिपोर्ट

उच्च मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण समग्र आर्थिक सुधार की सीमा को निर्धारित करेगा. बता दें, कंपनियों को मुद्रास्फीति की समस्या का सामना करना पड़ता है. पिछले कुछ महीनों से भारत में मुद्रास्फीति उच्च बनी हुई है, जो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 6 प्रतिशत के ऊपरी लक्ष्य से भी ज्यादा है. हालांकि, जून माह में इसमें थोड़ी कमी आई थी. यह 6.30 फीसदी से थोड़ी कम होकर 6.26 फीसदी पर पहुंची थी. Also Read - GDP Growth Rate: देश की GDP वृद्धि दर जुलाई-सितंबर तिमाही में 8.4 प्रतिशत रही

ऐसी संभावना जताई जा रही है कि जुलाई में खुदरा मुद्रास्फीति में और गिरावट आ सकती है. विनिर्माण लागत अधिक होने के कारण थोक मुद्रास्फीति दो अंकों से ऊपर रहने की संभावना बनी हुई है. इससे यह संकेत मिलते हैं कि विनिर्माण कंपनियां और माल उत्पादक उच्च मुद्रास्फीति दबाव का सामना कर रहे हैं. Also Read - Vegetables, Milk To Fuel: भारत में मध्यम वर्ग पर किस तरह पड़ रही है महंगाई की मार, घटती जा रही है क्रय शक्ति

हालांकि, इसके साथ एक बात और है. खुदरा मुद्रास्फीति (रिटेल इन्फ्लेशन) उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही है, जितनी थोक मुद्रास्फीति, क्योंकि कंपनियां इनपुट लागत ग्राहकों पर नहीं डाल रही हैं. कई कंपनियों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे बढ़ती इनपुट लागत से चिंतित हैं और उन्हें लगता है कि उन्हें जल्द ही इसे उपभोक्ताओं पर पास ऑन करना पड़ेगा.

उपभोक्ता मांग पर महामारी के प्रभाव के कारण कंपनियों ने वस्तुओं की कीमतों में तेजी से वृद्धि करने से परहेज कर रही हैं. घटती मांग को देखते हुए, फर्मों के पास उच्च लागत लागत के दबाव के बावजूद वस्तुओं की कीमतें कम रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. हालांकि, मांग बढ़ने के कारण कंपनियां अब कीमतों को कम रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं.

अर्थशास्त्रियों ने ब्लूमबर्ग न्यूज से बात करते हुए कहा कि बढ़ती लागत और उपभोक्ता विश्वास के साथ, अधिकांश कंपनियां जल्द ही उपभोक्ताओं को अपने सामान उच्च दरों पर प्रदान करेंगी.

एक बार जब कंपनियां बढ़ी हुई दरों को उपभोक्ताओं पर डालेंगी, तो खुदरा मुद्रास्फीति में तेजी से बढ़ोतरी देखी जाएगी. कीमतों में वृद्धि से एक ऐसा माहौल भी बनेगा जहां मांग और उपभोक्ता का विश्वास बनाए रखना मुश्किल होगा.

कंपनियां बढ़ी हुई लागत को उपभोक्ताओं पर डालेंगी, तो बढ़ेगी महंगाई

अगर कंपनियां वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी का फैसला करती हैं, तो इससे मुद्रास्फीति में अचानक बढ़ोतरी होगी – आरबीआई के लिए एक चिंताजनक बात हो सकती है, जो लंबे समय तक प्रमुख ब्याज दरों को कम रखने में कामयाब रहा है. आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि जब तक अर्थव्यवस्था स्थिर है, तब तक वह एक समायोजन नीति बनाए रखेगा.

हालांकि, मुद्रास्फीति में अचानक उछाल आने पर केंद्रीय बैंक को अपना रुख बदलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. कम ब्याज दर व्यवस्था से दूर जाने से समग्र अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है क्योंकि यह कई क्षेत्रों में कारोबार, तरलता और शेयर बाजारों को भी प्रभावित करेगा. फिलहाल जो स्थिति है, देश के आर्थिक विकास का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि कंपनियां बढ़ती इनपुट लागत और मांग की दुविधा से कैसे निपटने में कामयाब होती हैं?