नई दिल्ली. पीएम नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान बढ़ी बेरोजगारी दर को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर जमकर हमले किए थे. खासकर असंगठित क्षेत्र में करोड़ों की संख्या में रोजगार पैदा होने के सरकारी दावों को लेकर राजग-कार्यकाल की तीखी आलोचना की गई थी. पकौड़ा बेचने या ट्रक-टेंपो की खरीद में बढ़ोतरी को रोजगार से जोड़ने के सरकारी दावों का भी मजाक उड़ाया गया था. इसके बाद भारतीय सांख्यिकी संस्थान के उस आंकड़े के लीक होने, जिसमें पिछले 45 वर्षों में बेरोजगारी दर के उच्चतम स्तर पर पहुंच जाने का जिक्र था, को लेकर भी बड़ा बवाल मचा था. बेरोजगारी को लेकर विपक्ष के इन हमलों की धार को कुंद करने के लिए मोदी 2.0 की सरकार ने सत्ता संभालते ही रोजगार और निवेश पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया है. Also Read - अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ लेकर Kamala Harris ने रचा इतिहास

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हमारी सहयोगी वेबसाइट डीएनए की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में रोजगार के अलग-अलग आयाम को जानने-समझने के लिए सरकार ने एक बड़ा निर्णय लिया है. इसके तहत अगले छह महीनों में सरकार बड़ा आर्थिक सर्वेक्षण (Mega Economic Survey) कराने जा रही है. इसके तहत सड़क किनारे चाट-पकौड़ा बेचने वाले, स्टॉल लगाने वाले वेंडर, हॉकर्स आदि की गिनती करने की योजना है. देश के आर्थिक विकास में बड़े औद्योगिक संस्थानों और संस्थाओं के साथ-साथ छोटे उद्यमियों का योगदान महत्वपूर्ण होता है. अब तक किए जाने वाले आर्थिक सर्वेक्षणों में बड़े संस्थानों या संस्थाओं को तो शामिल किया जाता रहा है, लेकिन गली या नुक्कड़ या फिर सड़क किनारे ठेला-खोमचा लगाने वालों की गिनती नहीं होती. सरकार की मंशा है कि Mega Economic Survey के जरिए इस बार इन छोटे उद्यमियों- हॉकर, चाट-पकौड़ा बेचने वालों और सड़क किनारे स्टॉल लगाने वालों की भी गिनती की जाए. Also Read - Pradhan Mantri Awas Yojana: पीएम मोदी ने गरीबों को भेजे 2700 करोड़ रुपए, खातों में आए या नहीं, ऐसे करें चेक

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सरकार का मानना है कि इससे सेवा क्षेत्र में मिलने वाले रोजगार के साथ-साथ स्वरोजगार के जरिए देश की अर्थव्यवस्था को धार देने वाले तबके की हिस्सेदारी को भी रोजगार के आंकड़ों में शामिल किया जा सकेगा. मोदी 2.0 सरकार द्वारा कराए जाने वाले इस Mega Economic Survey से देश में असंगठित क्षेत्र में पैदा होने वाले रोजगार की पुख्ता जानकारी मिलेगी. इस मेगा-सर्वे के जरिए देश की 25 करोड़ से ज्यादा की घरेलू और 7 करोड़ संस्थाओं की गिनती की जाएगी. मेगा-सर्वे की प्रक्रिया अगले कुछ दिनों में शुरू होगी. अनुमान है कि अगले 6 महीनों में इसकी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी जाएगी. सरकार का मानना है कि इस Mega Economic Survey से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर विकास और अर्थव्यवस्था की व्यापक समीक्षा हो पाएगी. साथ ही सरकार की योजनाओं और नीतियों को भी ज्यादा गंभीर तरीके से जमीन पर उतारा जा सकेगा.

आपको बता दें कि बीते बुधवार को ही पीएम नरेंद्र मोदी ने निवेश बढ़ाने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने के दो महत्वपूर्ण मुद्दों से निपटने के लिए दो मंत्रिमंडल समितियां बनाई हैं. सरकार के सूत्रों ने बताया कि निवेश एवं वृद्धि तथा रोजगार एवं कौशल विकास पर बनी दोनों समितियों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे. निवेश एवं वृद्धि पर मंत्रिमंडल की समिति में गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और रेल तथा वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल सदस्य होंगे. रोजगार और कौशल विकास पर मंत्रिमंडल समिति में शाह, सीतारमण और गोयल के अलावा कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, कौशल विकास मंत्री एम एन पांडे, श्रम मंत्री संतोष कुमार गंगवार और आवासीय तथा शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी शामिल होंगे.

सूत्रों ने बताया कि मंत्रिमंडल समिति बनाने का प्रावधान है, लेकिन प्रधानमंत्री ने पिछले कार्यकाल के दौरान ऐसी कोई समिति नहीं बनाई थी. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्ष ने मोदी सरकार को हर साल दो करोड़ नौकरियां पैदा करने के वादे को पूरा ना करने को लेकर निशाना बनाया था. विपक्ष ने धीमी अर्थव्यवस्था का दावा करते हुए भी सरकार पर प्रहार किया था. सरकार का मानना है कि रोजगार और निवेश बढ़ाने के इन नए तरीकों से देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिलेगी. इसके साथ-साथ रोजगार को लेकर सरकार की मंशा पर भी स्थिति साफ होगी. इसके अलावा Mega Economic Survey की कवायद से न सिर्फ रोजगार के मुद्दे पर उठने वाले विपक्ष के सवालों का जवाब दिया जा सकेगा, बल्कि जनता के बीच सरकार की सकारात्मक छवि भी बनेगी.

(इनपुट – एजेंसी)

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