मुंबई: एमएसएमई क्षेत्र को देश की आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण इंजन माना जाता है, लेकिन नोटबंदी से ज्यादा जीएसटी से जुड़ी दिक्कतों ने सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के निर्यात को अधिक प्रभावित किया है. आरबीआई की ओर से शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है. एमएसएमई क्षेत्र का भारत के कुल निर्यात में इसका योगदान करीब 40 प्रतिशत है. रिपोर्ट में कहा गया है कि नोटबंदी से पहले ही एमएसएमई क्षेत्र में ऋण वृद्धि धीमी होने लगी और नोटबंदी के दौरान इसमें और गिरावट आई. Also Read - राष्‍ट्रपति शी के नेतृत्व में चीन ने भारत के प्रति आक्रामक विदेश नीति अपनाई है: US आयोग की रिपोर्ट

उम्मीद के उलट, ऐसा लगता है कि जीएसटी लागू होने का ऋण पर कोई अहम् प्रभाव नहीं पड़ा है. कुल मिलाकर, एमएसएमई कर्ज विशेष रूप से एमएसएमई को दिए जाने वाले माइक्रो लो में हालिया तिमाहियों में अच्छी वृद्धि देखी गई. अक्टूबर 2016 के बाद (नोटबंदी की अवधि) एमएसएमई निर्यात में मामूली कमजोरी दिखती है, लेकिन अप्रैल और अगस्त 2017 के दौरान में निर्यात में गिरावट आई. Also Read - अब 1540 सहकारी बैंक होंगे RBI की निगरानी में, कैबिनेट की मीटिंग में अहम फैसला

आरबीआई द्वारा प्रकाशित मिंट स्ट्रीट मेमो में कहा गया, “इनपुट टैक्स क्रेडिट और अग्रिम जीएसटी रिफंड में देरी के चलते एमएसएमई निर्यात को नोटबंदी से ज्यादा जीएसटी से जुड़ी दिक्कतों ने परेशान किया. इससे छोटे उद्योगों की कार्यशील पूंजी जरूरतें प्रभावित हुईं क्योंकि वह अपने दैनिक कामकाज के लिए नकदी पर निर्भर हैं.” रिजर्व बैंक द्वारा जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मिंट स्ट्रीट मेमो (एमएसएम) में व्यक्त विचार भारतीय रिजर्व बैंक के हों यह आवश्यक नहीं है. Also Read - सोशल मीडिया पर आखिर क्यों ट्रेंड करने लगा 'परांठा', जानें आनंद महिंद्रा ने क्यों ली चुटकी

अप्रैल-जून 2018 तिमाही के दौरान, एमएसएमई को बैंक द्वारा दिया गया कर्ज सालाना आधार पर औसतन 8.5 प्रतिशत बढ़ा. यह अप्रैल-जून 2015 के वृ्द्धि स्तर को दर्शाता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि एमएसएमई निर्यात के प्रमुख वस्तुयें जैसे रत्न एवं आभूषण, कालीन, कपड़ा, चमड़ा, हैंडलूम और हस्तशिल्प वस्तुओं उद्योग श्रम आधारित उद्योग हैं. यह कार्यशील पूंजी और अनुबंध मजदूरों के भुगतान के लिए नकद पर निर्भर हैं.