नई दिल्ली. यह हैरान कर देने वाला आंकड़ा है कि पिछले 5 वर्षों में देश के 10 निजी बैंकों के 1 लाख करोड़ का कर्ज डूब गया है. कर्ज फंसने की इस समस्या से सिर्फ निजी बैंक ही नहीं, बल्कि कई सरकारी बैंक भी परेशान हैं. ऐसे में देश के विभिन्न बैंकों द्वारा दिए जाने वाले कर्ज के फंसने के बाद होने वाली समस्या से बचने के लिए एक एजेंसी बनाने की सलाह दी गई है. बैंकों के फंसे कर्ज की गहराती समस्या के बीच लागत लेखाकारों की शीर्ष संस्था ‘इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICAI)’ ने बैंकों से दिए जाने वाले बड़े कर्ज प्रस्तावों की जांच-पड़ताल के लिए एक केंद्रीय एजेंसी बनाने का सुझाव दिया है. इसका कहना है कि इस एजेंसी में लागत लेखाकारों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाना चाहिए, ताकि कर्ज फंसने के मामलों में कमी लाई जा सके. Also Read - Bank Holidays in August 2020: अगस्त महीने में बैंकों की होने वाली है बंपर छुट्टी, जल्दी निपटाएं अपना काम

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ICAI के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय गुप्ता ने कहा कि बैंकों से जो भी बड़े कर्ज दिए जाते हैं, उन सभी की जांच-परख करने के लिए वित्त मंत्रालय द्वारा एक केन्द्रीय एजेंसी का गठन किया जाना चाहिए. ऐसे प्रस्तावों का लागत मूल्यांकन करने के साथ साथ परियोजना की दक्षता, वहनीयता को लेकर भी ऑडिट यानी उनकी लेखा परीक्षा होनी चाहिए. उल्लेखनीय है कि इन दिनों सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक बैंक फंसे कर्ज यानी एनपीए की समस्या का सामना कर रहे हैं. यह समस्या विशेष तौर से इस्पात, बिजली, दूरसंचार तथा कुछ अन्य क्षेत्रों में ज्यादा है. कड़ी प्रतिस्पर्धा से बाजार मूल्य घटने अथवा मांग कमजोर पड़ने से इन क्षेत्रों की कंपनियां वित्तीय संकट में फंस गई. गुप्ता का कहना है कि आमतौर पर हजारों करोड़ रुपए के बड़े कर्ज बैंकों के समूह द्वारा दिए जाते हैं. बड़े बैंकों के पास शोध एवं विकास के बेहतर साधन होते हैं, वह कर्ज प्रस्ताव का बेहतर आकलन कर सकते हैं लेकिन कई छोटे बैंक हैं, जिनके पास कर्ज प्रस्तावों का मूल्यांकन और लेखा ऑडिट करने की अच्छी सुविधाएं नहीं हैं. ऐसे में कर्ज प्रस्तावों पर विचार करने वाली केन्द्रीय एजेंसी बेहतर भूमिका निभा सकती है.

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जनता के पैसे के मूल्यांकन में गोपनीयता क्यों

ICAI के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय गुप्ता ने कहा कि आमतौर पर कंपनियां और उनके प्रवर्तक अपने उत्पाद की लागत को लेकर गोपनीयता का हवाला देते हैं. उन्होंने कहा, ‘किसी भी परियोजना में जब पूरा पैसा बैंकों का लगता है, जो कि जनता का पैसा है, तो फिर कंपनियों की तरफ से मूल्यांकन को लेकर गोपनीयता क्यों बरती जानी चाहिए. इसमें हर मामले में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिये.’ उन्होंने कहा कि किसी भी परियोजना या उद्यम की सफलता में बेहतर मूल्यांकन की बड़ी भूमिका होती है. भारतीय लागत लेखाकार संस्थान इन्हीं मुद्दों पर जोर देता है और उसका गुणवत्ता और दक्षता पर ज्यादा ध्यान रहता है. दूसरी तरफ वित्तीय लेखाकार केवल वित्तीय आंकड़ों पर ही ज्यादा ध्यान देते हैं.

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ICAI के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कहना है कि कई बार कंपनियों का कारोबार उनकी गुणवत्ता या मात्रात्मकता के मुताबिक नहीं बढ़ रहा होता है, बल्कि बाजार में उत्पाद के दाम बढ़ जाने की वजह से उनका कारोबार बढ़ जाता है. इस मामले में उन्होंने पेट्रोलियम कंपनियों का उदाहरण दिया. विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से तेल एवं गैस उत्पादन करने वाली कंपनियों का कारोबार बढ़ जाता है, इसमें कंपनी की तरफ से अपना कोई प्रयास नहीं होता है. कई बार तो कंपनी को वास्तव में नुकसान हो रहा होता है. ऐसे में उसके उत्पाद की लागत लेखापरीक्षा होने पर स्थिति का पता चल जाता है. बता दें कि देश में लागत लेखाकार पेशेवरों के कौशल विकास व नियमन के लिए संसद में पारित कानून से ICAI की स्थापना की गई. पहले इसका नाम इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट एंड वर्क्स एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICWAI) था.

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4 साल में कई गुना बढ़ा निजी बैंकों का एनपीए

देश के निजी बैंकों के NPA में लगातार हो रही वृद्धि बड़ा नुकसान है. इसी साल मई में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार कोटक महिंद्रा बैंक का NPA वर्ष 2013-14 में 1059 करोड़ रुपए था, जो अगले 4 वर्षों में बढ़कर 3825 करोड़ हो गया है. इसी तरह निजी क्षेत्र के एक बैंक, फेडरल बैंक का NPA 2013-14 के 1087 करोड़ से बढ़कर 2017-18 में 2796 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है. येस बैंक का NPA पांच साल पहले जहां सिर्फ 175 करोड़ रुपए था, वह मार्च 2018 में बढ़कर 2627 करोड़ रुपए हो गया है. इसी प्रकार निजी क्षेत्र के इंडसइंड बैंक का NPA पिछले 4 वर्षों में 621 करोड़ रुपए से बढ़कर 1705 करोड़ रुपए हो गया है. इसी तरह डीसीबी बैंक का एनपीए 2013-14 में जहां 138 करोड़ का था, वह मार्च 2018 में 369 करोड़ का हो गया है. इसके अलावा आरबीएल बैंक का एनपीए 5 वर्षों में 78 करोड़ से बढ़कर 567 करोड़ पर पहुंच गया है. एनपीए की इस लिस्ट में आखिरी पायदान पर रहे एयू स्मॉल फाइनेंस के एनपीए का आंकड़ा सिर्फ दो वर्षों का है. इस कंपनी का एनपीए वर्ष 2016-17 में जहां 125 करोड़ था, वह एक साल में बढ़कर 270 करोड़ हो गया है.

(इनपुट – एजेंसी)

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