नई दिल्लीः यात्रियों को सुहाने और सुरक्षित सफर का सपना दिखाने वाला भारतीय रेल इन दिनों खुद बेहद बुरे दौर से गुजर रहा है. रेल की आय और परिचालन खर्च का संतुलन इस तरह बिगड़ा है कि उसके पास आधुनिकीकरण, सुरक्षा, विस्तार आदि कार्यों के लिए एक पैसा नहीं बचता है. रेलवे का ऑपरेटिंग रेश्यो बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. बीते वित्त वर्ष में इसके 98.5 फीसदी पर पहुंचने का अनुमान लगाया गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक 98.5 फीसदी का ऑपरेटिंग रेश्यो बिना एडजस्टमेंट के 100 फीसदी के मार्क को पार कर सकता है. ऑपरेटिंग रेश्यो का मतलब रेलवे का संचालन खर्च है. यानी रेलवे को अगर 100 रुपये की आमदनी होती है तो उसे संचालन पर उसमें से 98.5 रुपये खर्च करना पड़ता है.

फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने इस बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की है. सूत्रों के हवाले से अखबार लिखता है कि बीते वित्त वर्ष में 96 फीसदी ऑपरेटिंग रेश्यो का संशोधित अनुमान लगाया गया था लेकिन यह 98.5 फीसदी की स्थिति काफी बुरी है. रेलवे के पास यात्री सुविधाएं बढ़ाने, आधुनिकीकरण, विस्तार आदि कामों के लिए केवल 1.50 रुपये ही बचते हैं.

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इससे पहले 2000-01 में रेलवे का ऑपरेटिंग रेश्यो 98.3 फीसदी तक पहुंचा था. इसके बाद से यह अब तक की सबसे बुरी स्थिति है. रिपोर्ट के मुताबिक इस ऑपरेटिंग रेश्यो के बारे में कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट को सूचित किया जाएगा. मौजूदा समय में रेलवे की आय संशोधित अनुमानों से 8500 करोड़ रुपये कम है.

रेलवे बोर्ड में फाइनेंशियल कमिश्नर एके प्रसाद के हवाले से कहा गया है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने की वजह से रेलवे का परिचालन खर्च बढ़ा है. पेंशन मद में 47 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. प्रसाद का कहना है कि जब-जब वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की गईं तब-तब ऑपरेटिंग रेश्यो बढ़ गया. प्रसाद के मुताबिक 7वें वेतन आयोग के कारण रेलवे पर 22 हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ा है.

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अधिकारियों ने किया ये खेल
जो भी हो, ऑपरेटिंग रेश्यो के 100 फीसदी तक पहुंचने से रोकने के लिए रेलवे के अधिकारियों ने बीते वित्त वर्ष के अंतिम दिन एक बड़ा खेल किया. रेलवे ने चालू वित्त वर्ष यानी 2018-19 में माल ढुलाई के लिए एडवांस में एनटीपीसी से 5000 करोड़ रुपये हासिल कर लिए. इस पैसे को बीते वित्त वर्ष की आय में दिखा दिया गया. इसी तरह बीत वित्त के अंतिम दिनों में ही रेलवे के एक सार्वजनिक उपक्रम से 2000 करोड़ रुपये लिए गए. लीज चार्ज के रूप में रेलवे ने अर्जित राजस्व की बजाय कुल बजटीय सहायता से 4000 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया. रेलवे राष्ट्रीय रेल सुरक्षा कोष में भी 5000 करोड़ रुपये जमा नहीं करा सका, जबकि केंद्र सरकार इस मद में 15000 करोड़ का भुगतान करती है.