
Manoj Yadav
'बिजनेस' की खबरों में खास रुचि रखने वाले मनोज यादव को 'पॉलिटिकल' खबरों से भी गहरा लगाव है. ये इंडिया.कॉम हिंदी के बिजनेस डेस्क पर कार्यरत हैं. इनके पास ... और पढ़ें
वित्त वर्ष 2025 में भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं. पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट ‘बजट 2025-26: भारत के समावेशी विकास को बढ़ावा’ के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकारों के राजस्व व्यय में वृद्धि के चलते सरकारी खपत में सुधार होने की संभावना है.
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में मांग बढ़ने, मुद्रास्फीति में नरमी और अनुकूल आधार प्रभाव के कारण निजी खपत में भी तेजी देखने को मिल सकती है. इसका मतलब है कि लोग अधिक खर्च करने की स्थिति में होंगे, जिससे बाजार में सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.
रिपोर्ट बताती है कि सेवाओं के निर्यात में अच्छी वृद्धि दर्ज की जाएगी. इससे भारत का कुल निर्यात भी मजबूत रहेगा, जिससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी.
पहले अग्रिम अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024 में 8.2 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर रही थी. लेकिन वित्त वर्ष 2025 में इसके 6.4 प्रतिशत तक रहने की उम्मीद है. इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं:
हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मजबूत घरेलू बाजार, बढ़ती कार्यशील आबादी और बेहतर आर्थिक बुनियादी ढांचे के कारण दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा.
सरकार ने वित्त वर्ष 2025 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 4.8 प्रतिशत रखा है, जो उसके पहले के 4.9 प्रतिशत अनुमान से कम है. वहीं, वित्त वर्ष 2026 के लिए इसे 4.4 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे 2026 तक इसे 4.5 प्रतिशत से नीचे लाने की प्रतिबद्धता बनी रहेगी.
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.3 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत के बीच रह सकती है. साथ ही, मुद्रास्फीति औसतन 4.5 प्रतिशत तक घटने की उम्मीद है. बेहतर फसल, सामान्य मानसून और कमोडिटी की कीमतों में गिरावट से महंगाई पर नियंत्रण संभव होगा.
रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में अस्थिरता कम होने की संभावना है. साथ ही, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भारत के तेल आयात पर दबाव कम होगा. इससे रुपये की विनिमय दर में भी सुधार आने की उम्मीद है.
गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2025 के लिए भारत की आर्थिक संभावनाएं मिश्रित हैं. जहां सरकारी खपत और निर्यात अर्थव्यवस्था को मजबूती देंगे, वहीं निजी खपत को बढ़ाने के लिए मुद्रास्फीति पर नियंत्रण जरूरी होगा. सरकार की नीतियों और वैश्विक परिस्थितियों पर भारतीय अर्थव्यवस्था की गति निर्भर करेगी.
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