पूर्व नौकरशाह शक्तिकांत दास को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का गवर्नर बनाए जाने के बाद भी केंद्रीय बैंक में सबकुछ ठीक नहीं है. कुछ माह पहले कार्यकाल पूरा होने से पहले उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाया गया था. लेकिन अब केंद्रीय बैंक एक अहम नीतिगत मसले पर गवर्नर और डिप्टी गवर्नर के बीच दो फाड़ हो गया है. गुरुवार को जारी मौद्रिक नीति में रेपो रेट में कटौती पर आरबीआई के दोनों शीर्ष अधिकारियों ने अलग-अलग राय रखी. मौद्रिक नीति समिति बनने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है. अब तक मौद्रिक नीति में जो बदलाव होते थे उस पर गवर्नर और डिप्टी गवर्नर की राय एक होती थी.

दरअसल, मौद्रिक नीति विभाग की अगुवाई डिप्टी गवर्नर विरल अचार्य करते हैं. गवर्नर शक्तिकांत दास अपनी पहली मौद्रिक समीक्षा नीति में रेपो रेट में कटौती के पक्षधर थे, लेकिन उनके डिप्टी और मौद्रिक नीति के प्रमुख अचार्य इसको यथावत बनाए रखने के पक्षधर थे. इस कारण पैदा विवाद में फैसला बहुमत से लिया गया. समिति के 6 में से चार सदस्यों ने रेपो रेट में कटौती के पक्ष में वोट दिया, लेकिन मौद्रिक नीति विभाग प्रमुख अचार्य और एक अन्य बाहरी सदस्य ने इसको यथावत रखने के पक्ष में वोट दिया. गौरतलब है कि इस समिति में शक्तिकांत दास, विरल अचार्य और माइकल डी पात्रा, केंद्रीय बैंक की ओर से सदस्य हैं, जबकि तीन अन्य सदस्य बैंक से बाहर के होते हैं.

आरबीआई ने गुरुवार को 18 महीने में पहली बार नीतिगत दर में कटौती करने के साथ ही कठोर नीतिगत दृष्टिकोण को भी नरम कर दिया, जिससे निकट भविष्य में आवास, वाहन और अन्य कर्ज सस्ते होने की उम्मीद बंधी है. इसके साथ ही केंद्रीय बैंक द्वारा नये वित्त वर्ष में भी ब्याज दर में और कमी लाने की संभावनाएं जगी है. नए गवर्नर शक्तिकांत दास के नेतृत्व में आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीस) की पहली बैठक में मुद्रास्फीति की नरमी को ध्यान में रखते हुए बहुमत के आधार पर नीतिगत ब्याज दर ‘रेपो’ को 0.25 प्रतिशत घटा कर 6.25 प्रतिशत करने का निर्णय किया गया. रेपो दर वह दर है जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को एक दिन के लिए नकद धन उपलब्ध कराता है. इस दर के कम होने से बैंकों के लिए धन सस्ता होगा और वे आने वाले दिनों में मकान, वाहन तथा अन्य निजी वस्तुओं की खरीद और उद्योग धंधे के लिए कर्ज सस्ता कर सकते हैं.

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केंद्रीय बैक का यह निर्णय मध्यम वर्गीय करदाताओं और छोटे किसानों की आय बढ़ाने वाले आंतरिक बजट के ठीक बाद आया है. इससे आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के सरकार के प्रयासों को बल मिलने की उम्मीद है. अंतरिम बजट में सरकार ने पांच लाख रुपये तक की कर योग्य आय को छूट देकर कर मुक्त करने के साथ ही दो हेक्टेयर से कम की जोत वाले किसानों के लिए 6,000 रुपये वार्षिक की आय समर्थन योजना की घोषणा की है. एक साल में इससे कुल मिलाकर 75,000 करोड़ रुपये की मदद पहुंचने का अनुमान है.

रिजर्व बैंक ने अपने नीतिगत दृष्टिकोण को भी नरम करके ‘तटस्थ‘ कर दिया है. अभी तक उसने मुद्रास्फीति के जोखिम के मद्देनजर इसे ‘ नपी-तुली कठोरता’ वाला कर रखा था. इससे संकेत मिलता है कि रिजर्व बैंक आगे चल कर रेपो दर में और कमी कर सकता है. केंद्रीय बैंक ने मुद्रास्फीति के लगातार नीचे बने रहने के मद्देनजर बाजार में कर्ज सस्ता करने वाला यह कदम उठाया है. खुदरा मुद्रास्फीति दिसंबर 2018 में 2.2 प्रतिशत थी जो इसका 18 माह का निम्नतम स्तर है. रेपो दर में 0.25 प्रतिशत कटौती के साथ ही रिवर्स रेपो दर भी इतनी ही घटकर 6 प्रतिशत रह गई. इसके साथ ही बैंक दर और सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) 6.50 प्रतिशत पर आ गई.