State Bank of India Moratorium Period: स्टेट बैंक अपने आवास और रिटेल लोन ग्राहकों को बड़ी राहत देने जा रहा है. बैंक कोरोना संकट के कारण ऐसा करने जा रहा है. बैंक ग्राहकों को 24 महीने का लोन मोरैटोरियम (Loan Moratorium) दे सकता है या फिर लोन की अवधि मोरैटोरियम पीरियड की अवधि के बराबर बढ़ा सकता है. Loan Moratorium का मतलब यह है कि ग्राहकों को एक निश्चित समय तक लोन की ईएमआई का भुगतान नहीं करने पर भी उनको डिफॉल्ट करार नहीं दिया जाएगा. मोरैटोरियम पीरियड की किस्त की राशि का भुगतान बाद में करना होता है. Also Read - Loan Moratorium Cashback: Lockdown के दौरान EMI चुकाने वालों को 5 नवंबर तक मिल जाएगा कैशबैक! जानें किन-किन लोगों को होगा फायदा

देश के सबसे बड़े बैंक ने सोमवार को कहा कि मोरैटोरियम पीरियड को दो साल तक बढ़ाया जा सकता है. ऐसे में अब अन्य बैंकों खासकर सरकारी बैंकों पर भी लोन मोरैटोरियम देने के लिए दबाव बढ़ेगा. आरबीआई के निर्देश के मुताबिक 1 मार्च 2020 से पहले लिए गए लोन में मोरैटोरियम पीरियड का विकल्प मिलेगा. हालांकि बैंक ने इसके साथ एक शर्त जोड़ी है कि ग्राहकों को यह साबित करना होगा कि उनकी आय कोविड-19 की वजह से प्रभावित हुई है. Also Read - Diwali Bonus: लॉकडाउन के दौरान समय पर EMI चुकाने वालों को कैशबैक देगी सरकार, जानें क्या है पूरा मामला

एसबीआई के मैनेजिंग डायरेक्टर सीएस सेट्टी ने कहा कि लोन रिस्ट्रक्चर के लिए बैंक पूरी तरह से ग्राहकों के मूल्यांकन पर निर्भर रहेगा. ग्राहक ही बताएंगे कि उन्हें कब तक अपनी आय सुचारू होने की संभावना दिख रही है. कोरोना से प्रभावित ग्राहकों के लिए लोन के पुर्नगठन के मामले में एसबीआई पहला बैंक है जो सामने आया है. अब उम्मीद की जा रही है कि अन्य बैंक भी यह कदम उठाएंगे. रिपोर्ट के मुताबिक निजी क्षेत्र के दो बड़े बैंक एचडीएफसी और आईसीआईसी भी इस महीने के अंत तक इस दिशा में कदम उठाएंगे. Also Read - Loan Moratorium Update: लोन मोरेटोरियम के दौरान कर्ज पर ब्याज छूट को लेकर वित्त मंत्रालय ने जारी किया यह दिशानिर्देश

उधर, एसबीआई के चेयरमैन रजनीश कुमार ने कहा कि बैंक जोखिम उठाने से बच नहीं रहे हैं, लेकिन ऐसे संकट के समय में सजग हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस समय ऋण की मांग ठहरी हुई है. उन्होंने कहा कि बैंक नहीं चाहते कि 2008 के बाद जैसी स्थिति की पुनरावृत्ति हो जब ऋण के लिए ग्राहकों से ब्योरा लेने के मानकों को ‘हलका’ किया गया था. देश के सबसे बड़े बैंक के प्रमुख ने कहा कि आंकड़ों से स्पष्ट पता चलता है कि अर्थव्यवस्था में निवेश नीचे आया है.

अखिल भारतीय प्रबंधन संघ (एआईएमए) द्वारा सोमवार को आयोजित एक वर्चुअल कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुमार ने कहा, ‘‘यदि पूंजीगत खर्च नहीं हो रहा है और अर्थव्यवस्था में उसी रफ्तार से निवेश नहीं आ रहा है, तो निश्चित रूप से यह मांग
का मामला है. जोखिम से बचने की स्थिति तब होगी जब मांग हो और बैंक कर्ज नहीं दे रहे हों.’’

रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार जुलाई में सालाना आधर पर गैर-खाद्य बैंक ऋण 6.7 प्रतिशत बढ़ा. पिछले साल समान महीने में इसमें 11.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. जुलाई में बैंक ऋण 91.48 लाख करोड़ रुपये पर था.

कुमार ने कहा कि बैंकों को कर्ज देने लिए प्रवर्तकों की ओर से इक्विटी की जरूरत होती है. उन्होंने कहा कि निवेश करने की क्षमता वाले लोगों या कंपनियों की संख्या में कमी आई है. उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थतियों में जरूरत इस बात की है कि ऐसी कंपनियां या उद्यमी सामने आएं जिनमें निवेश करने और कर्ज लेने की क्षमता हो. कुमार ने कहा, ‘‘2008 के बाद बैंकों ने काफी धन की आपूर्ति की थी. उस समय कर्ज देने के मानदंडों को ‘हलका’ किया गया था. बैंकिंग प्रणाली और देश को उसकी ऊंची कीमत चुकानी पड़ी.’’