बीते कई सप्ताह में प्याज की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई है. प्याज की आसमान छूती कीमतों ने औसत दर्जे के परिवार से लेकर बड़े-बड़े रेस्तरा मालिकों की नींद हराम कर दी है. रेस्तरां मालिकों का कहना है कि अगर प्याज की कीमतें दो-तीन महीने तक इसी तरह से बढ़ती रहीं, तो हम अपनी रेट लिस्ट में संशोधन करने के लिए बाध्य हो जाएंगे. जिससे रेस्तरां आदि में खाना-नाश्ता करने वालों को भी अपनी जेबें ढीली करनी पड़ेंगी. Also Read - Maharashtra Legislative Council Election Latest News, 6 सीटों पर वोटिंग चल रही, केंद्रीय मंत्री गडकरी ने डाला वोट

वहीं, प्याज के कारोबार से जुड़े लोगों का मानना है कि इस बात की संभावना भी नहीं है कि अगले दो-तीन महीनों में प्याज का ताजा स्टॉक मार्केट में आने लगेगा. उनका मानना है कि अगर सरकार आयात बढ़ाकर भी घरेलू मांग को पूरा करने की कोशिश करती है तब पर भी उसे पूरा नहीं किया जा सकता है. Also Read - मिसाल: पांचवीं तक पढ़ी मोबिना ने पढ़ाया IAS अफसरों को पाठ

गौरतलब है कि भारत में हर रोज औसतन 3,000 ट्रक प्याज की खपत होती है. लेकिन, इसकी आपूर्ति केवल 1,500 ट्रक ही हो पा रही है. यानी थोक मंडियों में माल आधा ही पहुंच रहा है. इससे यह साफ हो रहा है कि आपूर्ति घटने से प्याज की मांग पूरी नहीं हो पा रही है जिससे प्याज की कीमतों में बेतहासा बढ़ोतरी देखी जा रही है. Also Read - Urmila Mantondkar will join Shiv Sena: कांग्रेस का साथ छोड़ शिवसेना के साथ नई राजनीतिक पारी शुरू करेंगी उर्मिला मातोंडकर

महाराष्ट्र जिसे प्याज का गढ़ माना जाता है. वहां पर पुणे की थोक मंडी में प्याज की कीमतें 65 रुपये से बढ़कर 75 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गई हैं. अब थोक मंडी में भाव आसमान पर हैं तो खुदरा बाजार में भाव बढ़ना लाज़मी हो जाता है. पुणे में प्याज के खुदरा बाजार में मूल्य 100 रुपये से बढ़कर 130 रुपये प्रति किलो हो गया है.

प्याज के खुदरा विक्रेताओं और व्यापारियों का मानना है कि अभी तो प्याज के भाव और बढ़ेंगे, क्योंकि आने वाले माह में त्योहार है और नवरात्रि के बाद वैसे भी प्याज के भाव बढ़ जाते हैं, क्योंकि नवरात्रि के दिनों में ज्यादातर लोग प्याज का सेवन नहीं करते हैं और मांसाहार भी काफी कम हो जाता है. ऐसे में अब नवरात्र बीत गया है और जो लोग उस दौरान प्याज का सेवन नहीं करते थे. अब वे भी प्याज का सेवन करेंगे और मांसाहार भी बढ़ेगा. जिससे प्याज की मांग ज्यादा बढ़ने की संभावना है. नवरात्र के बाद खासकरके भारत के उत्तरी राज्यों में मांग बढ़ने की पूरी संभावना रहती है. कारोबारियों का मानना है कि अक्टूबर के अंत तक प्याज का थोक बाजार भाव 100 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकता है.

प्याज की कीमतों में बेतहासा बढ़ोतरी होने का कारण यह बताया जा रहा है कि भारी बारिश के कारण कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों में फसल खराब हो गई. जो भी प्याज भारत में उपलब्ध है, वह महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की है.

आपको बता दें, बाजार में नई उपज आने में तीन से चार महीने लगेंगे. भारी बारिश ने खेतों में प्याज की फसलों को नुकसान पहुंचाया है. जो भी प्याज बाजार में आ रहा है वह मार्च और अप्रैल की उपज का है. सबसे बड़ी बात यह है कि थोक मंडियों में प्याज की आमद दिन-प्रति-दिन घटती जा रही है. पुणे के थोक बाजार में प्याज की आमद 500 ट्रक से घटकर 150 ट्रक प्रति दिन हो गई है. यानी सामान्य दिनों में जहां पर हर रोज जहां पर 500 ट्रक पहुंचते थे. अब केवल तीन चौथाई ही आमद हो रही है.

प्याज का उत्पादन

प्याज एक मौसमी फसल है जो भारत में एक वर्ष में दो से तीन बार उपजाई जाती है. मार्च के अंत तक उपजाया जाने वाला प्याज अक्टूबर के अंत और नवंबर की शुरुआत तक मांग को पूरा करता है.

इसके बीच में अगस्त के महीने में प्याज की ताजा फसल दक्षिणी राज्यों से आती है. मध्य अक्टूबर तक, खरीफ प्याज की शुरुआती फसल भी बाजारों में पहुंचने लगती है और नवंबर के मध्य तक, खरीफ की फसल की उपज देर से खरीफ के मौसम में आती है.

इस साल, अनियमित मानसून ने इस चक्र को तोड़ दिया. भारी बारिश के कारण आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक सहित दक्षिणी राज्यों में खरीफ की लगभग 50 फीसदी चौपट हो गई.

इससे न केवल पुणे का थोक बाजार, बल्कि नासिक का लासलगांव का प्याज केंद्र का भी नियमित खरीद-बिक्री का समीकरण गड़बड़ा गया है. खेतों से भी ताजा प्याज की आवक नहीं हो रही है. अब जबकि अक्टूबर का महीना भी लगभग समाप्ति की ओर है, लेकिन अभी तक ताजा प्याज की आमद नहीं शुरू हुई है. जिससे आपूर्ति की श्रृंखला टूटती नजर आ रही है.

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में सालाना प्याज का उत्पादन 2.5 करोड़ मीट्रिक टन होता है. भारत की आवश्यकता 1.5 करोड़ मीट्रिक टन की है. इस साल बारिश के कारण प्याज की फसलों में लगभग 50 फीसदी का नुकसान हुआ है. प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी का मूल कारण यही माना जा रहा है.