PSBs privatisation: समाचार एजेंसी रायटर्स की सूत्रों के हवाले से एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत सरकार ने चार बैंकों के निजीकरण का फैसला कर लिया है. ये बैंक मध्यम आकार के हैं, जिन्हें शॉर्टलिस्ट किया गया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि यह फैसला सरकारी राजस्व को बढ़ाने के लिए लिया गया है. सरकार बैंकिंग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजीकरण करना चाहती है. वर्तमान में, बैंकिंग क्षेत्र में सरकार की बड़ी हिस्सेदारी है, जिसमें हजारों लोग काम करते हैं. Also Read - UPSC Exam: UPSC की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों को झटका, नहीं मिलेगा अतिरिक्त मौका

बैंकों का निजीकरण एक राजनीतिक रूप से जोखिम भरा कदम है क्योंकि यह रोजगार के लिए बड़ा खतरा बन सकता है. बैंक कर्मचारियों ने इस कदम के बारे में पहले ही आशंका व्यक्त की है. भारत सरकार वर्तमान में बैंकिंग क्षेत्र में दो-स्तरीय बैंकों के साथ निजीकरण शुरू करना चाहती है. Also Read - Bank Holidays in March 2021: मार्च में 11 दिन बंद रहेंगे बैंक, जानिए तारीख और छुट्टियों की वजह

सरकार द्वारा शॉर्टलिस्ट किए गए चार बैंकों में बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के नाम हैं. हालांकि, इस मामले को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है और यह महज एक अनुमान पर आधारित बताया जा रहा है. यह अनुमान सूत्रों के हवाले से लिखी गई रिपोर्ट पर आधारित है. Also Read - Last Day Of RailTel IPO: 11 गुना सब्सक्राइब हुआ इश्यू, रिटेल पार्ट 13 गुना बुक, यहां पर जानें सबकुछ

सूत्रों के अनुसार, चार में से दो बैंकों का निजीकरण वित्तीय वर्ष 2021-22 में हो सकता है, जो अप्रैल में शुरू होगा. सरकार छोटे बैंकों से आगे कदम उठा सकती है क्योंकि इससे आगे क्या किया जाए इसके लिए एक आइडिया मिल जाएगा. सूत्रों ने यह भी कहा कि आने वाले वर्षों में बड़े बैंकों को बेचने की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है. हालांकि, सरकार स्टेट बैंक में अपनी बड़ी हिस्सेदारी बनाए रखना चाहती है, क्योंकि इसके जरिए देश के ग्रामीण क्षेत्रों में कई सरकारी योजनाएं चलाई जाती हैं.

नियमों के अनुसार, एक बैंक जिसके 50 फीसदी से ज्यादा शेयर सरकार के पास हैं, उसे सरकारी बैंक घोषित किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए आरबीआई और अन्य नियामकों से मंजूरी लेनी होगी. निजी बैंक में 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी सरकार या किसी संस्था या कंपनी के पास नहीं है. इन शेयरों का स्वामित्व व्यक्ति के साथ-साथ निगम के पास भी होता है.

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है – राष्ट्रीयकृत बैंक और स्टेट बैंक और इसके सहयोगी. राष्ट्रीयकृत बैंकों का बैंकिंग इकाई और कामकाज पर सरकारी नियंत्रण होता है. सरकारी और निजी बैंकों द्वारा बैंक में जमा धन पर दी जाने वाली ब्याज दर लगभग बराबर है. हालांकि, बंधन बैंक, एयरटेल बैंक जैसे नए बैंक अन्य बैंकों की तुलना में थोड़ा बेहतर ब्याज दर दे रहे हैं.

दोनों बैंकों में क्या है फर्क?

लोन के मामले में, सार्वजनिक बैंक की ब्याज दरें निजी बैंकों की तुलना में थोड़ी कम हैं. जैसे एसबीआई ने कम ब्याज दरों पर महिला ग्राहकों के लिए होम लोन की पेशकश की है. जिसमें 30 लाख तक के लोन पर 8.35 फीसदी ब्याज दर है. निजी बैंकों को बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए जाना जाता है, लेकिन वे इन सेवाओं के लिए शुल्क वूसलते हैं. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शुल्क और निजी बैंकों से कम रहते हैं. सरकारी कर्मचारियों के वेतन, सावधि जमा और लॉकर आदि के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अधिकांश खाते खोले जाते हैं. उनका ग्राहक आधार निजी बैंकों की तुलना में बड़ा है.

आईडीबीआई बैंक का उदाहरण

आईडीबीआई एक सरकारी बैंक था, जो 1964 में देश में स्थापित किया गया था. एलआईसी ने आईडीबीआई में 21,000 करोड़ रुपये का निवेश करके 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी थी. इसके बाद, LIC और सरकार ने मिलकर IDBI बैंक को 9,300 करोड़ रुपये दिए. आईडीबीआई बैंक में एलआईसी की 51 फीसदी हिस्सेदारी है, जबकि सरकार की 47 फीसदी हिस्सेदारी है.

जानें- क्या होता है ग्राहकों पर असर

बैंकिंग विशेषज्ञों का कहना है कि निजीकरण किए जाने से ग्राहकों के खाते प्रभावित नहीं होते हैं. बैंक अपनी सेवा को पहले की तरह बनाए रखता है. इसके अलावा, घर, व्यक्तिगत और ऑटो ऋण की ब्याज दरें और सुविधाएं पहले जैसी ही बनी हुई रहती हैं.