नई दिल्ली. ऑफिस के मोबाइल बिल, घर का किराया, यूनिफॉर्म और इस तरह के मदों में आने वाली सभी चीजों के रीइंबर्समेंट को लेकर चल रही अफवाहों पर विराम लग गया है. वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सभी रीइंबर्समेंट पहले की तरह ही रहेंगे और वे जीएसटी के दायरे में नहीं आएंगे. बता दें कि पहले इस बात की अफवाह थी कि केंद्र सरकार अप्रत्यक्ष कमाई को भी जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार कर रही है.

पिछले दिनो मीडिया रिपोर्ट्स थी कि कंपनियां रीइंबर्समेंट स्ट्रक्चर को रीस्ट्रक्चर करने पर विचार कर रही हैं, जिससे कर्मचारियों और कंपनियों दोनों को जीएसटी से कम से कम घाटा हो. वहीं, कंपनियां टैक्स बचाने के लिए नए तरीके से सैलरी ब्रकेअप पर काम कर रही हैं. वित्त मंत्रालय के अधिकारी के मुताबिक, यदि रीइंबर्समेंट कॉन्ट्रेक्ट का हिस्सा है तो जीएसटी नहीं लगाया जाएगा.

बता दें कि कंपनियां कर्मचारियों के लिए इस तरह का सैलरी ब्रेकअप बनाती हैं, जिससे सर्विस के बदले बिना किसी रसीद के कर्मचारियों को पेमेंट कर देती हैं. इससे इन सेवाओं पर जीएसटी का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. लेकिन ये सेवाएं जीएसटी के दायरे में आ जातीं तो कंपनियों के लिए मजबूरी बन जाती है. इसके अलावा भी हाल के दिनों में कई ऐसे फैसले किए हैं जिससे नौकरीपेशा लोगों को फायदा होता दिख रहा है.

भविष्य निधि खाते के लिए भी विकल्प
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के खाताधारकों को चालू वित्त वर्ष के दौरान अपने भविष्य निधि खाते से शेयर बाजार में निवेश को तय सीमा से कम अथवा अधिक करने का विकल्प मिल सकता है. ईपीएफओ की योजना तीन महीने में ईटीएफ निवेश को पीएफ खाते में जमा करने की सुविधा देने की है. ईपीएफओ के केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त वी. पी. जॉय ने कहा , ‘हमें खाताधारकों को उनका ईटीएफ निवेश पीएफ खाते में हस्तांतरित करने की सहुलियत देने के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करना होगा. इसमें दो से तीन महीने का समय लग सकता है.’ उन्होंने कहा, ‘एक बार ऐसा कर लेने के बाद हम अगले चरण में जाएंगे जिसके तहत सदस्यों को शेयर बाजारों में निवेश घटाने-बढ़ाने की सुविधा मिलेगी.’ ईपीएफओ की शीर्ष निर्णय इकाई केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) ने खाताधारकों को शेयर निवेश की मौजूदा 15 प्रतिशत की अनिवार्य सीमा से अधिक या कम निवेश की सुविधा उपलब्ध कराने की संभावनाएं तलाशने की पिछले सप्ताह मंजूरी दी थी.

टेक होम सैलरी
नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ ही कंपनियों के अकाउंट डिपार्टमेंट कर्मचारियों से इनवेस्टमेंट डिक्लरेशन मांगने लगे हैं. अगर आप इनवेस्टमेंट डिक्लरेशन नहीं देते हैं तो नियोक्ता यानी कंपनी आपकी सैलरी से टीडीसी (टैक्स ऑन सोर्स) की कटौती करने लगेगी. यह टीडीएस आपकी कुल अनुमानित सैलरी के हिसाब से काटी जाएगी. दरअसल, इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 192 के तहत यह नियोक्ता की जवाबदेही होती है कि वह अपने कर्मचारियों से समय पर टैक्स की कटौती करे. इनवेस्टमेंट डिक्लरेशन में कर्मचारी चालू वित्त वर्ष के दौरान कर बचाने के लिए किए जाने वाले निवेश के बारे में जानकारी देता है. जब आप इनवेस्टमेंट डिक्लरेशन देते हैं तो आपकी कंपनी उतनी रकम अपनी सैलरी से घटा देती है. इससे आपका कर योग्य आय कम हो जाता है और कर का बोझ घट जाता है. इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80सी के तहत निवेश सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. इसके तहत आप सालाना 1.5 लाख रुपये का निवेश कर सकते हैं. इसके अलावा आप 80डी और सेक्शन 24 के तहत भी इनवेस्टमेंट डिक्लेरेशन दे सकते हैं.