
Anjali Karmakar
अंजलि कर्मकार 12 साल से जर्नलिज्म की फील्ड में एक्टिव हैं. उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया है. यहीं से मास कॉम में मास्टर्स की डिग्री ली ... और पढ़ें
हमारे आसपास ऐसे कई लोग मिल जाएंगे, जो जिनका एक्टिव सर्विस या नौकरी से रिटायरमेंट हो चुका है. उनकी पेंशन आती है. लेकिन, एक्स्ट्रा इनकम के लिए वो फ्रीलांसिंग (Freelancing) या कंसल्टेंसी (Consultancy) करते हैं. इससे एक तरह रेगुलर कमाई का रास्ता खुल जाता है. साथ में अपनी हॉबी भी फॉलो करते हैं. बाकी टैक्सपेयर्स की तरह फ्रीलांसर या कंसल्टेंट भी इनकम टैक्स के नियमों के दायरे में आते हैं. उनको भी अपनी इनकम स्लैब के हिसाब से टैक्स देना पड़ता है. अगर ज्यादा टैक्स चुका दिया, तो उसे वापस पाने के लिए फ्रीलांसर भी ITR भरते हैं. लेकिन, इनकम टैक्स एक्ट के एक खास सेक्शन के जरिए फ्रीलांसर या कंसल्टेंट अपनी कमाई पर अच्छा-खासा टैक्स भी बचा सकते हैं.
प्रेसम्प्टिव टैक्स स्कीम (Presumptive Tax Scheme)
इनकम टैक्स एक्ट 1961 के सेक्शन 44ADA के तहत प्रेसम्प्टिव टैक्सेशन रिटर्न फाइलिंग को बहुत आसान बना देती है. इसके जरिए फ्रीलांसर्स अपनी इनकम प्रेसम्प्टिव बेसिस पर डिक्लेयर करते हैं. इसमें आपके ग्रॉस रिसिप्ट या टर्नओवर का 50% टैक्सेबल इनकम होता है. बाकी 50% को टैक्स फ्री एक्सपेंस माना जाता है. भले ही ये आपके एक्चुअल एक्सपेंस से कम ही क्यों न हो.
कैसे बचेगा टैक्स?
अगर आप सेक्शन 44ADA के तहत प्रेसम्प्टिव टैक्सेशन अपनाते हैं, तो अपको टोटल इनकम के 50% पर ही टैक्स देना होगा. इसके प्रोसेस में ज्यादा हिसाब भी नहीं लगाना पड़ता है. टैक्स बचाने के लिए आपको अपने ऑफिस रेंट, इंटरनेट बिल, सॉफ्टवेयर सब्सक्रिप्शन जैसे प्रोफेशनल खर्चों की रसीदें भी संभाल कर रखनी चाहिए.
GST के तहत रजिस्ट्रेशन कब जरूरी?
अगर आपकी सालाना इनकम 20 लाख रुपये (या कुछ राज्यों में 10 लाख रुपये) से ज्यादा है, तो आपको GST के तहत रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी है. रजिस्ट्रेशन के बाद, आपको भारत में अपने कस्टमर्स के इनवॉइस पर 18% GST देना होगा. GST रजिस्ट्रेशन और समय-समय पर रिटर्न फाइल करना जरूरी हो सकता है.
बिजनेस पर होने वाले खर्च भी कर सकते हैं क्लेम
टैक्स डिडक्शन क्लेम करने के लिए ये सेक्शन भी रखें याद
सेक्शन 80C: इसमें 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स सेविंग की जा सकती है. इसे क्लेम करने के लिए फ्रीलांसर को पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (PPF), इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ELSS), लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी वगैरह में इंवेस्ट करना होगा.
सेक्शन 80 D: इसके जरिए खुद के लाइफ या मेडिकल इंश्योरेंस, परिवार के लिए लिए गए इंश्योरेंस पर दिए गए प्रीमियम का पैसा क्लेम किया जा सकता है.
सेक्शन 80E: अगर आप एजुकेशन लोन के तहत ब्याज देते हैं, तो इस सेक्शन के तहत टैक्स डिडक्शन क्लेम कर सकते हैं.
सेक्शन 80EEA: अगर आपने पहली बार लोन लेकर घर खरीदा है, तो इस सेक्शन के तहत ब्याज का पैसा क्लेम किया जा सकता है.
सेक्शन 80G: अगर आप सोशल वर्क के लिए डोनेशन करते हैं, तो इसके तहत क्लेम कर सकते हैं.
सेक्शन 80U: इस सेक्शन के तहत डिसएबल (Disable) व्यक्ति डिडक्शन क्लेम कर सकते हैं.
ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें Business Hindi की और अन्य ताजा-तरीन खबरें
By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts Cookies Policy.