रिटायरमेंट के बाद आ रही पेंशन, कंसल्टेंसी से भी कर रहे कमाई, जान लें टैक्स बचाने का स्मार्ट तरीका

इनकम टैक्स एक्ट 1961 के सेक्शन 44ADA के तहत प्रेसम्प्टिव टैक्सेशन रिटर्न फाइलिंग को बहुत आसान बना देती है. इसके जरिए फ्रीलांसर्स अपनी इनकम प्रेसम्प्टिव बेसिस पर डिक्लेयर करते हैं.

Published date india.com Published: January 21, 2026 9:54 PM IST
रिटायरमेंट के बाद आ रही पेंशन, कंसल्टेंसी से भी कर रहे कमाई, जान लें टैक्स बचाने का स्मार्ट तरीका
बाकी टैक्सपेयर्स की तरह फ्रीलांसर या कंसल्टेंट भी इनकम टैक्स के नियमों के दायरे में आते हैं.

हमारे आसपास ऐसे कई लोग मिल जाएंगे, जो जिनका एक्टिव सर्विस या नौकरी से रिटायरमेंट हो चुका है. उनकी पेंशन आती है. लेकिन, एक्स्ट्रा इनकम के लिए वो फ्रीलांसिंग (Freelancing) या कंसल्टेंसी (Consultancy) करते हैं. इससे एक तरह रेगुलर कमाई का रास्ता खुल जाता है. साथ में अपनी हॉबी भी फॉलो करते हैं. बाकी टैक्सपेयर्स की तरह फ्रीलांसर या कंसल्टेंट भी इनकम टैक्स के नियमों के दायरे में आते हैं. उनको भी अपनी इनकम स्लैब के हिसाब से टैक्स देना पड़ता है. अगर ज्यादा टैक्स चुका दिया, तो उसे वापस पाने के लिए फ्रीलांसर भी ITR भरते हैं. लेकिन, इनकम टैक्स एक्ट के एक खास सेक्शन के जरिए फ्रीलांसर या कंसल्टेंट अपनी कमाई पर अच्छा-खासा टैक्स भी बचा सकते हैं.

प्रेसम्प्टिव टैक्स स्कीम (Presumptive Tax Scheme)
इनकम टैक्स एक्ट 1961 के सेक्शन 44ADA के तहत प्रेसम्प्टिव टैक्सेशन रिटर्न फाइलिंग को बहुत आसान बना देती है. इसके जरिए फ्रीलांसर्स अपनी इनकम प्रेसम्प्टिव बेसिस पर डिक्लेयर करते हैं. इसमें आपके ग्रॉस रिसिप्ट या टर्नओवर का 50% टैक्सेबल इनकम होता है. बाकी 50% को टैक्स फ्री एक्सपेंस माना जाता है. भले ही ये आपके एक्चुअल एक्सपेंस से कम ही क्यों न हो.

कैसे बचेगा टैक्स?
अगर आप सेक्शन 44ADA के तहत प्रेसम्प्टिव टैक्सेशन अपनाते हैं, तो अपको टोटल इनकम के 50% पर ही टैक्स देना होगा. इसके प्रोसेस में ज्यादा हिसाब भी नहीं लगाना पड़ता है. टैक्स बचाने के लिए आपको अपने ऑफिस रेंट, इंटरनेट बिल, सॉफ्टवेयर सब्सक्रिप्शन जैसे प्रोफेशनल खर्चों की रसीदें भी संभाल कर रखनी चाहिए.

GST के तहत रजिस्ट्रेशन कब जरूरी?
अगर आपकी सालाना इनकम 20 लाख रुपये (या कुछ राज्यों में 10 लाख रुपये) से ज्यादा है, तो आपको GST के तहत रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी है. रजिस्ट्रेशन के बाद, आपको भारत में अपने कस्टमर्स के इनवॉइस पर 18% GST देना होगा. GST रजिस्ट्रेशन और समय-समय पर रिटर्न फाइल करना जरूरी हो सकता है.

बिजनेस पर होने वाले खर्च भी कर सकते हैं क्लेम

  • अगर आप ऑफिस स्पेस किराये पर लेकर काम कर रहे हैं. इसके लिए पानी, बिजली का बिल भी भरते हैं, तो आपके आफिस रेंट और यूटिलिटी को बिजनेस एक्सपेंस के रूप में क्लेम कर सकते हैं.
  • अगर आपके घर का 20% एरिया ऑफिस के रूप में इस्तेमाल होता है, तो आप 20% रेंट और यूटिलिटी बिल को बिजनेस एक्सपेंस के तौर पर क्लेम कर पाएंगे.
  • अगर आप फ्रीलांसिंग के लिए किसी खास सॉफ्टवेयर जैसे एडोब क्रिएटिव क्लाउड, माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस या प्रोजेक्ट मैनेजर का इस्तेमाल करते हैं, तो इनके सब्सक्रिप्शन पर किया गया खर्च बिजनेस एक्सपेंस के तौर पर क्लेम करने योग्य है.
  • किसी बिजनेस डील या मीटिंग के लिए ली गई फ्लाइट टिकट, होटल का खर्चा और लोकल ट्रांसपोर्ट पर हुए खर्चे पर भी डिडक्शन क्लेम किया जा सकता है.
  • फ्रीलांसर अकाउंटेंट की पेमेंट, लीगल एडवाइजर्स या कंसल्टेंट फीस पर भी डिडक्शन क्लेम किया जा सकता है.
  • फ्रीलांसिंग के दौरान गूगल पर ऐड देने, सोशल मीडिया प्रमोशन या क्रिएटिंग मार्केटिंग मटेरियल पर हुआ खर्च भी टैक्स डिडक्शन के दायरे में आता है.

टैक्स डिडक्शन क्लेम करने के लिए ये सेक्शन भी रखें याद

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सेक्शन 80C: इसमें 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स सेविंग की जा सकती है. इसे क्लेम करने के लिए फ्रीलांसर को पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (PPF), इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ELSS), लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी वगैरह में इंवेस्ट करना होगा.

सेक्शन 80 D: इसके जरिए खुद के लाइफ या मेडिकल इंश्योरेंस, परिवार के लिए लिए गए इंश्योरेंस पर दिए गए प्रीमियम का पैसा क्लेम किया जा सकता है.

सेक्शन 80E: अगर आप एजुकेशन लोन के तहत ब्याज देते हैं, तो इस सेक्शन के तहत टैक्स डिडक्शन क्लेम कर सकते हैं.

सेक्शन 80EEA: अगर आपने पहली बार लोन लेकर घर खरीदा है, तो इस सेक्शन के तहत ब्याज का पैसा क्लेम किया जा सकता है.

सेक्शन 80G: अगर आप सोशल वर्क के लिए डोनेशन करते हैं, तो इसके तहत क्लेम कर सकते हैं.

सेक्शन 80U: इस सेक्शन के तहत डिसएबल (Disable) व्यक्ति डिडक्शन क्लेम कर सकते हैं.

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