चेन्नई. पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाली छात्रों की संख्या में हुई अपार बढ़ोतरी के कारण ऐसी परीक्षाएं लेने वाली संस्थाओं या एजेंसियों ने निगेटिव मार्किंग की व्यवस्था अपना रखी है. इसको लेकर एक तरफ जहां एजेंसियां प्रतियोगी परीक्षाओं के माहौल को सख्त बनाने की दलील देती है, वहीं दूसरी ओर इसका नकारात्मक असर छात्रों पर पड़ता है. सिर्फ सही जवाब देने या गलत उत्तर देकर नंबर कटवाने से बचने के लिए छात्रों को मानसिक तनाव से गुजरना पड़ता है. मद्रास हाईकोर्ट ने छात्रों की इसी परेशानी को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है. अदालत ने कहा है कि इस व्यवस्था से छात्रों के ब्रेन पर असर पड़ता है, इसलिए इस पर फिर से विचार किया जाना चाहिए. Also Read - CBSE Board 10th 12th Exam 2021: CBSE कक्षा 10वीं, 12वीं की प्रैक्टिकल परीक्षा इस महीने हो सकती है आयोजित, जानें इससे संबंधित डिटेल

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मद्रास उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि सीबीएसई (CBSE) द्वारा संचालित होने वाली जेईई जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में निगेटिव मार्किंग की व्यवस्था पर फिर से विचार किए जाने की जरूरत है. क्योंकि यह मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करता है और उन्हें बुद्धिमानी के साथ अंदाजा लगाने से रोकता है. जस्टिस आर महादेवन ने JEE (Mains) परीक्षा में बैठे एस नेलसन प्रभाकर की एक याचिका का निपटारा करते हुए यह टिप्पणी की. प्रभाकर 2013 में इस परीक्षा में बैठे थे. उन्होंने एससी श्रेणी के तहत यह परीक्षा दी थी. निगेटिव मार्किंग के चलते वह कट ऑफ से तीन नंबर पीछे रह गए थे. Also Read - Board Exams में लाना चाहते हैं सबसे अधिक अंक? यहां जानें आसान और बेहतरीन ट्रिक

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इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी भौतिकी और गणित की उत्तर पुस्तिकाओं का फिर से मूल्यांकन करने के लिए सीबीएसई को एक निर्देश देने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया था. अदालत द्वारा अंतरिम राहत दिए जाने के बावजूद सीबीएसई ने उन्हें JEE (Advance) में बैठने देने की इजाजत नहीं दी थी.

(इनपुट – एजेंसी)