नई दिल्ली: अगर आपको यह लगता है कि शहरों में रहने वाले और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र जिस तरह धड़ाधड़ अंग्रेजी बोलते हैं, उसी तरह उन्हें अंग्रेजी लिखनी और पढ़नी भी आती होगी, तो आप गलत हैं. हाल में होने वाले एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में शहरी इलाकों में रहने वाले और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई करने वाले छात्रों को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया गया है. 20 राज्यों में किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि शहरी निजी स्कूलों में पढ़ाई करने वाले 10 में से 9 छात्र सही-सही अंग्रेजी नहीं पढ़ पाते. Also Read - Coronavirus: IIT Delhi ने छात्रों से कहा, 15 मार्च तक छात्रावास छोड़ दें

UGC NET December 2018: nta.ac.in पर 1 सितंबर से रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शुरू Also Read - VIDEO: क्लास में सपना चौधरी के 'गोली चल जावेगी' गाने पर खूब नाचे मैडम और सर, सस्पेंड हो गए

यह खुलासा ‘Where India reads 2017-18’ की रिपोर्ट में किया गया है. इस सर्वेक्षण में 20 राज्यों के 106 स्कूलों में IV, V और VI कक्षा में पढ़ाई कर रहे 19,765 छात्रों को शामिल किया गया. इसमें दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, और जम्मू-कश्मीर के छात्र भी शामिल किए गए. Also Read - दिल्ली के सरकारी स्कूल में मेलानिया ट्रंप ने बच्चों को लगा लिया गले, हाथ मिलाकर कहा- आप शानदार हैं

इस सर्वे को Stones2Milestones नाम की एक संस्था ने आयोजित किया था, जिसकी समीक्षा ऑस्ट्रेलियन काउंसिल ऑफ एजुकेशन रिसर्च (ACER) ने की है.

Rajasthan Headmaster Recruitment 2018: एडमिट कार्ड rpsc.rajasthan.gov.in पर जारी

रिपोर्ट में कहा गया है कि समस्या हमारे घरों में मौजूद है. “ज्यादातर भारतीय घरों में अंग्रेजी दूसरी या तीसरी भाषा है. अधिकांश भारतीय बच्चे अपने घर में क्षेत्रीय बोली या मातृ भाषा या हिन्दी में बात करते हैं. वही बच्चे जब स्कूल में पहुंचते हैं तो यह उम्मीद की जाती है कि वह एक नई भाषा सिखेंगे जो कि उनके लिए विदेशी भाषा है. नई भाषा का सीखना और सिखाना बहुत ही औपचारिक रूप से होता है.

RRB ALP Admit Card 2018: 29, 30 और 31 की परीक्षा के लिए एडमिट कार्ड जारी

Stones2Milestones के सह-संस्थापक निखिल सराफ ने इस बारे में कहा कि अंग्रेजी को लेकर हमने शिक्षकों की देखरेख में छात्रों का ऑनलाइन टेस्ट लिया. इसमें छात्रों के कॉम्प्रीहेंसन, वोकैबलरी और पढ़ने की क्षमता की जांच की गई. कुछ छात्रों ने अनुमान से भी ज्यादा जल्दी और हड़बड़ी में जवाब दिए, जो इस उम्र के किसी भी छात्र से उम्मीद नहीं की जाती. इसलिए उन्हें स्कोरिंग प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया. इससे यह बात स्पष्ट होती है कि छात्रों में रीडिंग यानी पढ़ाई को लेकर आलस है, वह पढ़ाई को लेकर गंभीर नहींं हैं और उनकी निगरानी भी ठीक नहीं हो रही है.

सर्वेक्षण में आए नतीजों के बाद स्कूलों को सुधार के कई सुझाव दिए गए. इस सूची में एक सुझाव यह भी था कि छात्रों के लिए लाइब्रेरी का पीरियड सिर्फ किताबे देखने का या समय काटने का जरिया ना हो. बल्कि इस पीरियड में छात्रों की पढ़ने की क्षमता को बढ़ाने के लिए उनसे रीडिंग कराई जानी चाहिए.

एजुकेशन और करियर की अन्य खबरों को पढ़ने के लिए करियर न्यूज पर क्लिक करें.