नई दिल्ली. छत्तीसगढ़ के जिस जंगल की खाक छानने में मुगल बादशाह अकबर सफल न हुए. भारत के हर इलाके तक अपनी पहुंच बनाने वाले ब्रिटिश सत्ता के पहरुए न पहुंचे सके. यहां तक कि भारत सरकार के पास भी इन जंगलों की पुख्ता जानकारी नहीं है, उन जंगलों के बीच से लोकसभा चुनाव के इस मौसम में एक अच्छी खबर आई है. जी हां, छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ जंगल, जिसको हम या आप नक्सल प्रभावित इलाके के रूप में जानते-पहचानते हैं, वहां आदिवासी समाज की एक लड़की ने दवा की एक दुकान खोल दी है. 23 साल की आदिवासी युवती का यह काम इतिहास रचने जैसा है. क्योंकि माओवादी या नक्सलियों के गढ़ में जहां सरकारी सुविधाएं न के बराबर हैं, स्वास्थ्य संबंधी इंतजाम बस नाम के हैं, वहां किरता डोरपा नाम की इस युवती की हिम्मत सचमुच दाद देने वाली है.

दवा के लिए जाना पड़ता था 70 किलोमीटर दूर
छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ इलाका 3,900 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ इलाका है. इसका समूचा भाग घने जंगलों का है. आजादी से पहले या उसके बाद की सरकारें इस इलाके से अंजान बनी रही, तो नाम के अनुरूप पूरे देश के लिए यह इलाका अबूझ ही बना रहा. बहरहाल, इसी अबूझमाड़ इलाके में स्थित प्रदेश के नारायणपुर जिले के ओरछा में किरता डोरपा ने दवा की दुकान शुरू की है. अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, मुरिया आदिवासी समाज से आने वाली किरता की दुकान की अहमियत क्या है, इसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक लोगों को दवा के लिए ओरछा से 70 किलोमीटर दूर नारायणपुर आना पड़ता था. तब जाकर किसी केमिस्ट से मुलाकात यानी दवा मिलना संभव हो पाता था. ओरछा में रहकर ही अपनी प्राथमिक शिक्षा हासिल करने वाली किरता डोरपा की यह दवा दुकान इस इलाके के लोगों के लिए वरदान से कम नहीं है.

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घने जंगलों के बीच खुली है दवा दुकान
किरता ने अपनी दुकान खोलने के लिए वह जगह चुनी है, जहां ऐसे किसी ‘स्टार्ट-अप’ की बात सोची भी नहीं जा सकती. उसने घने जंगलों के बीच स्थित इंद्रावती नेशनल पार्क के पास यह दुकान शुरू की है. किरता ने टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ बातचीत में कहा कि सरकार ने इस इलाके में जन औषधि केंद्र खोला था. लेकिन कुछ ही महीने चलने के बाद यह केंद्र बंद हो गया. किरता डोरपा ने बताया, ‘जन औषधि केंद्र के बंद होने के बाद इलाके के लोगों के सामने फिर एक बार दवा उपलब्धता की समस्या हो गई. इसके बाद ही मैंने दवा दुकान खोलने का फैसला किया.’

दवा दुकान शुरू करने से पहले किरता ने इलाके में इस बात का पता लगाया कि लोगों को किन-किन दवाओं की जरूरत पड़ती है. उसने अखबार के साथ बातचीत में कहा, ‘उसकी दुकान में हर वह दवा मिलती है, जिसकी जरूरत यहां के लोगों को है. शुरुआत में कुछ दिक्कतें आईं, लेकिन हमने इसके लिए मेहनत की और आखिरकार दुकान खुल गई. मुझे बहुत खुशी है कि अब यहां के लोगों को दवा के लिए लंबी दूरी नहीं तय करनी पड़ेगी. क्योंकि गांव के पास दवा मिल जाने से उनका समय, पैसा और जीवन भी बचेगा.’

सरकारी अधिकारी भी कर रहे पहल की तारीफ
ओरछा में किरता डोरपा की दवा दुकान न सिर्फ स्थानीय लोगों के लिए राहत की खबर लेकर आई है, बल्कि सरकारी अधिकारी भी इसकी तारीफ कर रहे हैं. नारायणपुर जिले के चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. आनंद राम गोटा ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि ओरछा के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में आम तौर पर लोगों को सरकार की तरफ से मुफ्त दवाएं मिल जाती हैं. लेकिन कई बार सेंटर पर दवाओं की कमी के कारण लोगों को निराशा होती है. किरता की दुकान खुलने से अब यह समस्या नहीं होगी. खासकर माओवाद प्रभावित इलाके में यह दुकान स्थानीय लोगों के लिए बहुत बड़ी सुविधा के रूप में सामने आएगा. किरता को भी इल्म है कि उसकी यह पहल अनोखी है, लेकिन वह इसका श्रेय नहीं लेती है. बल्कि उसने दुकान शुरू करने के प्रति इलाके के सरपंच, पंचायत सचिव और स्थानीय लोगों का आभार जताया. किरता ने कहा कि बिना स्थानीय लोगों की मदद के उसका यह सपना पूरा होना मुश्किल था.

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