रायपुर: छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह जो पिछले 15 वर्षो से राज्य में नक्सलियों से लड़ रहे हैं, उनका कहना है कि वह नक्सलियों से बातचीत के लिए तैयार हैं, बशर्ते उनके सर्वोच्च नेता बातचीत में शामिल हों. उनका कहना है कि नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई, दुनिया में सबसे मुश्किल लड़ाई है. उन्होंने साथ ही जोर देकर कहा कि नक्सलवाद वर्तमान में केवल दो जिलों बीजापुर और सुकमा में केवल 15-20 प्रतिशत इलाकों में प्रभावी है.Also Read - Maoists called bandh in 4 States: माओवादियों का चार राज्यों में 3 दिन का बंद आज से, झारखंड में सुरक्षा व्यवस्था चौकस

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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सबसे लंबे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री रहे सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा, “नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई, दुनिया में सबसे मुश्किल लड़ाई है. यह वह लड़ाई है, जिसमें हमारे अपने लोग (नक्सली) लुंगी पहने घूमते हैं और अचानक गोलीबारी शुरू कर देते हैं. ऐसे हालातों में एक जवान क्या करेगा? वे (नक्सली) खुद को महिलाओं, बच्चों और मासूम ग्रामीणों से घेरे रहते हैं. हम कुछ नहीं कर सकते. हम सभी को नहीं मार सकते.” उन्होंने कहा कि सीमा पर लड़ाई इससे आसान है, क्योंकि उसमें दुश्मनों के बारे में पता होता है, जबकि नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई अलग है. उन्होंने कहा कि सीमा पर हमें अपनी चौकियों का पता होता है और हम आसानी से दुश्मन को पहचान सकते हैं. हम उनके खिलाफ बंदूकें, बम और अन्य भारी हथियारों का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन हम उनके खिलाफ बम और अन्य हथियारों का इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि वे ग्रामीणों से घिरे होते हैं. Also Read - पुलिस कार्रवाई से बौखलाए नक्सली, यूपी-बिहार सहित इन राज्यों में बुलाया बंद, कितना होगा असर?

मुख्यमंत्री ने कहा बातचीत में क्या समस्या है? हम तैयार हैं..

रमन सिंह ने शीर्ष नक्सली नेताओं को बातचीत के लिए आमंत्रित करते हुए विकास कार्यों में खुद को शामिल करके मुख्यधारा से जुड़ने का आग्रह किया. उन्होंने कहा, “बातचीत में क्या समस्या है? हम तैयार हैं, लेकिन हम जिला स्तर के नक्सलियों से बात नहीं कर सकते. वे तो केवल शीर्ष स्तर के नक्सली नेताओं के दिशानिर्देशों पर काम कर रहे हैं. जब भी बातचीत होगी, शीर्ष नेतृत्व से होगी, जिसमें पांच-सात पोलित ब्यूरो सदस्य भी हों. अगर वे आगे आएं तो हम कोई समाधान खोज सकते हैं.” उन्होंने कहा कि यह केवल छत्तीसगढ़ की समस्या नहीं है. वे छह राज्यों में फैले हैं. इनमें से अधिकांश नक्सली आंध्र प्रदेश से, जबकि कुछ ओडिशा, तेलंगाना और महाराष्ट्र के गढ़चिरोली से अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं. बस्तर 40,000 किलोमीटर इलाके में फैला है, जो केरल से भी बड़ा इलाका है. वे मानवता के खिलाफ अपराध करने के बाद इनमें से किसी भी राज्य में भाग जाते हैं.

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मुख्यमंत्री ने कहा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास कार्य के जरिए उनकी सरकार उनके प्रभाव पर अंकुश लगाने और उसे रोकने में कामयाब रही है. उन्होंने नक्सली गतिविधियों के गढ़ रहे दंतेवाड़ा का जिक्र करते हुए कहा, “अब आप दंतेवाड़ा के किसी भी इलाके में दोपहिया वाहन पर भी बिना डर के घूम सकते हैं. इन इलाकों में जाने पर आपको बदलाव नजर आएगा. सड़कों और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करके हम लोगों का विश्वास हासिल करने में सफल रहे हैं.”

मुख्यमंत्री ने कहा कि बिजली की बदलाव में प्रमुख भूमिका होती है..

उन्होंने कहा, “जब किसी व्यक्ति को रोशनी (बिजली) की आदत हो जाती है, तो वह अंधेरे की बात नहीं करता. मैं हर घर में बिजली पहुंचाने का प्रयास कर रहा हूं. एक बार यह हो जाने पर हम हर छात्र को स्मार्टफोन बांटेंगे.” उन्होंने कहा कि आज हम ऐसे स्तर पर पहुंच चुके हैं, जहां केवल 6,40,000 घरों में ही बिजली नहीं है. इस साल जून तक इन घरों में भी बिजली पहुंच जाएगी. उन्होंने कहा कि दंतेवाड़ा और सुकमा के कुछ इलाकों में जहां बिजली आपूर्ति में समस्याओं का सामना करना पड़ा रहा है, वहां हम सौर लालटेन बांट रहे हैं. अगर नक्सलियों को किसी घर में यह लालटेन मिलती हैं, तो वे उसे तोड़ देते हैं. अब हम विद्यार्थियों को ये लालटेन बांट रहे हैं और वे इसे अपनी पढ़ाई के लिए इस्तेमाल करते हैं.

नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में आने वाली चुनौतियों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में छत्तीसगढ़ ही एकमात्र राज्य है, जहां राष्ट्रीय राजमार्गो के 150 किलोमीटर के हिस्से में मिट्टी की सड़के हैं. क्योंकि सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) जिसे 2003 में सड़कें बनाने का काम दिया गया था, उसने नक्सलियों के डर से इस काम से इंकार कर दिया था. उन्होंने कहा कि आखिरकार, हमने 150 किलोमीटर लंबी इस सड़क को स्थानीय ठेकेदारों से बनवाने का निर्णय लिया. अब जगदलपुर, दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर ये सभी सड़कों से भली भांति जुड़े हुए हैं. (इनपुट-एजेंसी)