सुरों के जादूगर कहे जाने वाले ए.आर रहमान 6 जनवरी यानी आज अपना 51वां जन्मदिन मना रहे हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें लगभग 26 साल हो चुके हैं और इस यात्रा के दौरान उन्होंने तमाम मधुर धुनें बनाई और अपनी आवाज का जादू बिखेरा. उनका गाना ‘रूप सुहाना लगता है’ हो या ‘रोजा जानेमन’ या फिर ‘जय हो’, लोगों को मुंह ज़ुबानी याद है. उनकी फैन फॉलोइंग न केवल हिंदुस्तान में है बल्कि विदेशों में भी है.

काफी कम लोग जानते हैं कि उनका पूरा नाम अल्लाह रक्खा रहमान है लेकिन वह ए. आर. रहमान नाम से ही फेमस हैं. भारतीय फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार हैं जिन्होंने मुख्य रूप से हिन्दी और तमिल फिल्मों में संगीत दिया है. इनका जन्म 6 जनवरी, 1967 को चेन्नई, तमिलनाडु में हुआ. जन्म के बाद उनका नाम ‘अरुणाचलम् शेखर दिलीप कुमार मुदलियार’ रखा गया. धर्मपरिवर्तन के बाद उन्होंने अल्लाह रक्खा रहमान नाम रख लिया.

रहमान ने अपनी मातृभाषा तमिल के अलावा हिंदी तथा कई अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी संगीत दिया है. टाइम्स मैगजीन ने उन्हें मोजार्ट ऑफ मद्रास की उपाधि ने नवाजा है. रहमान गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय व्यक्ति हैं. ए. आर. रहमान ऐसे पहले भारतीय हैं जिन्हें ब्रिटिश भारतीय फिल्म स्लम डॉग मिलेनियर में उनके संगीत के लिए दो ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त हुए है. इसी फिल्म के गीत ‘जय हो’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ साउंडट्रैक कंपाइलेशन और सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीत की श्रेणी में दो ग्रैमी पुरस्कार भी मिल चुके हैं.

रहमान को संगीत अपने पिता से विरासत में मिली है. उनके पिता राजगोपाल कुलशेखर (आर. के. शेखर) मलयालम फ़िल्मों में संगीतकार थे. रहमान ने संगीत की शिक्षा मास्टर धनराज से ली. मात्र 11 वर्ष की उम्र में अपने बचपन के मित्र शिवमणि के साथ रहमान बैंड रुट्स के लिए की-बोर्ड (सिंथेसाइजर) बजाने का कार्य करते थे. वे इलैयराजा के बैंड के लिए भी काम करते थे. चेन्नई के “नेमेसिस एवेन्यू” बैंड की स्थापना का श्रेय रहमान को ही जाता है. रहमान की-बोर्ड, पियानो, हारमोनियम और गिटार भी बजा लेते हैं. वे सिंथेसाइजर को कला और टेक्नोलॉजी का अद्भुत संगम मानते हैं.

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