बात लखनऊ की है- आज यहाँ आख़िरी दिन है पूरे चालीस दिन हमने यहाँ जिये, एक भी दिन बोरियत नहीं हुई. शुरू के कुछ दिन तो लगा ही की बेशक ये एक रिसोर्ट का कमरा है फिर धीरे धीरे हमने इस कमरे को घर समझना शुरू कर दिया. यहाँ तक कि इस कमरे का झाड़ू पोछा भी मैंने स्वयं करना शुरू कर दिया यद्यपि पिंटू, मिथुन और छोटू रोज़ सफ़ाई के लिए आते थे तो कभी साफ़ करवा लेता था कभी नहीं.Also Read - Monalisa Hot Photo Shoot: शॉर्ट ड्रेस में मोनालिसा का दिखा Bold अंदाज, देखें भोजपुरी एक्ट्रेस की कातिल अदाएं..

कुलदीप भैया जो इस रिसोर्ट के केअर टेकर हैं, कुछ ही दिनों बाद अच्छे मित्र बन गये . कुछ दूरी पर उनका गॉव है, जब भी वो गॉव जाते थे तो मेरे लिए एक बोतल में बढ़िया भैंस का दूध लेकर आते थे. वो दूध दिन में गरम करता था मैं, बढ़िया मोटी मलाई बनती थी उसमें.
वो मलाई इकठ्ठी करके उससे घी तक बनाया मैंने😊. Also Read - Karisma Kapoor को याद आए पुराने दिन, वीडियो शेयर कर दिखाया 30 साल का सफर

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रात को गरम दूध पीकर सो जाना और बचे हुए दूध को बोतल में भरकर, बाथरूम वाली बाल्टी में पानी भरकर रख देता था वो दूध सुबह तक नहीं फटता था, फिर सुबह उसी दूध की बढ़िया कड़क चाय बनती थी.

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कुछ ‘ख़ास लोग’ चाय की चुस्कियाँ लेने मेरे पास आते भी थे वो कहानी फिर कभी..
यहाँ की सुबह मोर के बोलने से शुरू होती थी. मोर अक्सर लॉन में सुबह सुबह आकर नाचता था, कभी छत की मुंडेर पर तो कभी किसी ऊंचे पेड़ पर अक्सर मोर बैठ हुए देखे हमने.. सुबह सुबह घास पर गिरी ओस की बूंदों पर नंगे पैर वाली वॉक होती थी, एक विशेष किस्म के फूल जो सुबह खिले मिलते थे वो शाम को मुरझा जाते थे, लेकिन अगली सुबह मैं फिर उन्हें खिला हुआ पाता था. उन फूलों से हमने ज़िन्दगी के बहुत सबक सीखे .

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प्रतिदिन शूटिंग ख़त्म होने के बाद मैं वॉक ज़रूर करता था, बहुत अच्छा लगता था फिर रात 10 बजे के आस पास खाना फिर अपने कमरे में चले जाना, अगले दिन की शूटिंग की स्क्रिप्ट पढ़ना, याद करना, ख़्वाब देखना,रातों को उठकर खिड़की से बाहर देखना फिर सो जाना… तमाम कुछ है क्या क्या लिखूं.. बहुत कुछ जो छूट रहा है, थोड़ा भावुक हो जाता हूं मैं कहीं से जाने पर अक्सर, अब जो कुछ सूझा वो इस कविता के माध्यम से लिख रहा हूं❤️

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आसान नहीं होता है झोला उठाकर चल देना,
छूट जाता है बहुत कुछ पीछे,
छूट जाता है वो कमरा वो घर,
जहाँ रहे हम इतने दिन,
छूट जाती हैं वो खिड़कियां वो दरवाज़े वो दीवारें,
जहाँ बन चुके होते हैं हमारी उंगलियों के निशान,
छूट जाता है वो बिस्तर उसकी सिलवटें,
छूट जाते हैं तकिये पर आँसुओं के कुछ निशान,
कुछ ख़्वाब कुछ परेशानियां,
छूट जाते हैं पर्दों पर कुछ रिफ्लेकशन्स,
छूट जाती हैं आईने में हमारी अच्छी बुरी शक्लें,
छूट जाते हैं फर्श पर पाँवों के निशान,
छूट जाते हैं वो लोग जो दरवाज़ा खटखटाने आते थे,
छूट जाता है उस जगह का स्वाद,
छूट जाता है अपना बहुत कुछ,
पेस्ट, ब्रश, कोई कपड़ा कोई रुमाल,
आधा इस्तेमाल किया हुआ साबुन, शेविंग क्रीम,
कुछ पुराने पेपर्स, रैपर्स, कुछ कबाड़,
छूट जाता है वहाँ अपने दिल का कोई कोना,
थोड़ा मन थोड़ा दिमाग़,
छूट जाता है, वहाँ कोई अधूरा ख़्वाब.