निर्देशक: अश्विनी अय्यर तिवारी, साकेत चौधरी और अभिषेक चौबे
कलाकार: अभिषेक बनर्जी, जोया हुसैन, कुणाल कपूर, निखिल द्विवेदी, पालोमी, रिंकू राजगुरु और डेलजाद हिवाल
रेटिंग: 3.5/5Also Read - Neha Dhupia ने बच्चे को दूध पिलाते हुए की फोटो शेयर, वायरल हुआ डेयरिंग अंदाज

इंसान हैं तो जाहिर है जज़्बात होंगे. जज़्बात होंगे तो प्यार होगा ही. लेकिन क्या वाकई इतना आसान होता है मन की बात को कह पाना. मुंबई जैसा शहर जहां किसी के पास सांस लेने की फुरसत नहीं है. अपने गांव. घर. परिवार से दूर अगर यहां कोई आता है उसे नौकरी तो मिल जाती है नहीं मिलता है तो कोई दिल की बात सुनने वाला. ऐसे में इन्सान और अकेला हो जाता है. दम घुटता है. कुछ कहने का मन करता है लेकिन कहां कहे किससे कहे. कोई नहीं मिलता. फिर वो अपने आप से बातें करने लगता है. लोग ऐसे इन्सानों को पागल कहते हैं. इन्हीं इमोशन्स को एक धागे में पिरोती है नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ तीन डायरेक्टर अश्विनी अय्यर तिवारी, साकेत चौधरी और अभिषेक चौबे ‘ की सीरीज़ अनकही कहानियां’ Also Read - Kamya Punjabi Joins Congress: 'किन्नर बहू' की सास Kamya Punjabi ने राजनीति में की एंट्री, कांग्रेस में हुईं शामिल

पहली कहानी- पागल ही था तो वो कपड़े की दुकान पर सेल्समैन का काम करने वाला मध्यप्रदेश का लड़का प्रदीप लोहारिया. (अभिषेक बनर्जी) खूब मेहनत करता. साफ-सफाई. कपड़े लपेटना. ग्राहकों को सामान खरीदने के लिए लुभाना. देर रात घर पहुंचना. कभी भूखे पेट सोना तो कभी बिस्कुट को पानी में डुबो कर खाना. सब अच्छा ही तो चल रहा था. फिर एक दिन दुकानदार प्रदीप को दुकान में लड़की का पुतला लाने को कहता है ताकि सेल को और बढ़ाया जा सके. पुतले को दुकान के फ्रंट पर खड़ा कर दिया जाता है. बात यहीं तक होती तो ठीक था पर प्रदीप को उस पुतले से प्यार हो जाता है. जब दुकानदार को इस बात का पता चलता है तो वो उसे काम से निकाल देता है. प्रदीप का मन भटकता रहता है. रोता है. घुटता है. शायद एक झलक तो कहीं देखने को मिल जाए. और फिर एक दिन उसे पुतला तो मिल जाता है लेकिन…….बहुत कुछ छूट जाता है. Also Read - Aafat-E-Ishq की लल्लो Neha Sharma ने रिबन बांध की दो चोटी, मजेदार है करेक्टर देखें Trailer

अश्विनी अय्यर तिवारी द्वारा निर्देशित ये एपिसोड भी कल्पना पर ही आधारित है जिसका यथार्थ से तो दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. लेकिन हां अगर इसे सिर्फ फिल्म और फेरी टेल के तौर पर देखा जाए तो दर्शकों को अच्छा लगेगा. अभिनेता अभिषेक बनर्जी का अभिनय हमेशा की तरह शानदार है.

फिर शुरू होती है मुंबई की दूसरी कहानी जो कि ( Jayant Kaikini’s Kannada novel Madhyantara) पर बेस्ड है. मुंबई के लोगों का सिंगल थियेटर में फिल्मों को देखने का क्रेज़. कैंटीन में समोसा बेचता लड़का. रोज़ बालों में फूल लगाकर फिल्म देखने आती चाल की लड़की. आंखों ही आंखों में बातें. इंतजार. मुलाकातें. नजदीकियां फिर प्यार. लेकिन फिर दोनों की जिंदगी में कुछ ऐसा होता है कि सब छूट जाता है. फिल्म को देखकर सैराट की याद आ जाती है. अभिषेक चौबे की ये कहानी दर्शकों को पसंद आएगी. स्क्रीन प्ले बढ़िया है. हमेशा की तरह उन्होंने कम में कुछ ज्यादा कहने की कोशिश की है.

फिल्म की आखिरी और तीसरी कहानी को साकेत चौधरी ने डायरेक्ट किया है.  कहानी जीनत लखानी और साकेत ने लिखी है. जिसमें मैरिड लाइफ की सच्चाई को बताने की कोशिश की गई है. पत्नी को पता चलता है कि उसके पति का ऑफिस की ही एक महिला के साथ अफेयर है. लेकिन वो बजाय उसको बताने या लड़ने के उस महिला के पति का नंबर कही से निकालती है. दोनों मिलते हैं. ये जानने की कोशिश करते हैं कि उनके रिश्ते में ऐसी क्या कमी रह गई थी जो उनके पति-पत्नी को एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर करना पड़ा. लेकिन इस बात का पता करते-करते वे खुद ही एक दूसरे के करीब हो जाते हैं. और फिर कुछ ऐसा होता है जो अनकहा रह जाता है.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अनकही कहानियां… प्यार. इमोशन्स और दर्द पर आधारित कहानियां हैं जो आज के दौर में भी लोगों को पसंद आएंगी.