पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जितना एक राजनेता के रूप में सराहे जाते थे उतना ही उन्हें एक अच्छे इंसान और बेहतरीन कवि के रूप में भी लोगों का प्यार मिला. अटल सिर्फ एक नाम ही नहीं एक जज्बा है निर्भय होने का. किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मानने का. वीर रस से सराबोर उनकी कविताएं जब भी पढ़ी जाती हैं, वे रोंगटे खड़े कर देती हैं. ऐसे में एक वाक्या याद आता है जब साल 1988 में वाजपेयी किडनी का इलाज कराने अमेरिका गए थे तब धर्मवीर भारती को उन्होंने एक खत लिखा था. जिसमें उन्होंने मौत को मात देने के जज्बे को शब्दों में लिखा था. आज एक बार फिर कविता गुनगुनाने का वक्त था- ‘मौत से ठन गई’… Also Read - क्या है पीएम मोदी का 'चैंपियन'? छोटे उद्योग के लिए संजीवनी साबित हो सकता है ये प्लेटफॉर्म

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मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आजमा।

मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

इस खत में अटल ने धर्मवीर भारती को बताया था कि डॉक्टरों ने उन्हें सर्जरी की सलाह दी है जिसके बाद से उनकी नींद गायब हो गई है. दिलचस्प बात यह भी है कि अमेरिका में अटल को इलाज के लिए भेजने वाले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ही थे. बता दें, गुरूवार को अटल बिहारी वाजपेयी का दिल्ली के एम्स में निधन हो गया.

 

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