नई दिल्ली. भोजपुरी फिल्मों के गाने आज भले ही चलताऊ या अश्लील या फिर सस्ते मनोरंजन वाले लगते हों, लेकिन भोजपुरी फिल्मों के कई ऐसे गाने भी हैं जिसे सुनकर आप बिना गुनगुनाए नहीं रह पाएंगे. भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के सदाबहार गाने हों या ‘बलम परेदेशिया’ में मो. रफी का गाया हुआ ‘गोरकी पतरकी गे’, इन गानों ने अपने समय में काफी लोकप्रियता बटोरी और दर्शकों का दिल जीता. इन गानों में न तो अश्लीलता थी और न ही फूहड़पन. अलबत्ता इनका संगीत इतना कर्णप्रिय था कि भोजपुरी के अलावा दूसरे भाषाई राज्यों में भी इन्हें सराहा गया. खासकर भोजपुरी की पहली फिल्म कही गई ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के गाने तो आज भी उतनी ही तन्मयता के साथ सुने जाते हैं. बॉलीवुड की फिल्मों को अपने गानों से सजाने वाले बिहार के संगीतकार चित्रगुप्त ने इस फिल्म में संगीत दिया था.

 

हिन्दी फिल्मों में भी भोजपुरी गानों का रहा है जलवा
हिन्दी फिल्मों में भी भोजपुरी भाषा का इस्तेमाल होता रहा है. फिल्म ‘गंगा जमुना’ हो या ‘गोदान’ या फिर ‘नदिया के पार’ हो नए जमाने की ‘मैंने प्यार किया’. इन फिल्मों में इस्तेमाल किए गए भोजपुरी गानों ने खूब लोकप्रियता बटोरी है. हालांकि फिल्म ‘नदिया के पार’ की पूरी कहानी, इसके लोकेशन और फिल्म के डायलॉग बिहार और उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि के ही थे, लेकिन इस फिल्म को भोजपुरी फिल्मों में शुमार नहीं किया जाता है. हां, इस फिल्म के कई गानों में जरूर भोजपुरी का प्रभाव देखा जाता है. हालांकि इसमें भी कई लोग कहते हैं कि इस फिल्म के गानों में भोजपुरी और अवधी, दोनों का मिश्रण है. फिर भी ‘कौन दिशा में ले के चला…’, ‘सांची कहे तोरे आवन से हमरे’ जैसे गाने हमें भोजपुरी भाषा की मिठास का परिचय तो करा ही देते हैं.

 

 

लोकगीतों के प्रशंसक थे कुमार गंधर्व
भोजपुरी लोक संगीत की मिठास के बारे में कई प्रख्यात संगीतज्ञों ने भी लिखा है. डॉ. शैलेश श्रीवास्तव ने अपनी किताब, ‘भोजपुरी संस्कार गीत और प्रसार माध्यम’ में लोक गीत-संगीत के बारे कुमार गंधर्व की कही बात का उदाहरण दिया है. ख्याल और ठुमरी गायन के पुरोधा कुमार गंधर्व ने लोकगीतों के बारे में लिखा है, ‘बचपन में मैं ये समझता था कि राग बनाए जाते हैं, किंतु अनुभव से इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि राग बनाए नहीं जाते, बन जाते हैं. हम लोकधुनों में रागों को छुपा हुआ पाते हैं. उन्हें पकड़कर जब हम प्रकट कर देते हैं, तो शास्त्रीय पक्ष सामने आ जाता है. लोक धुनें निसर्ग की तरह पूर्ण होती हैं. उनमें कोई न कोई राग अवश्य होता है. उसके लिए दृष्टि की आवश्यकता है.’ कुमार गंधर्व की कही बातों के संदर्भ में हम भोजपुरी संगीत की मिठास को समझ सकते हैं.

भोजपुरी फिल्म ‘बलम परदेशिया’ का गाना ‘गोरकी पतरकी गे’ को महान गायक मो. रफी ने अपनी आवाज दी थी. फिल्म के रिलीज होने के बाद इस गाने ने धूम मचा दी थी. सिर्फ भोजपुरी बोलने वाले इलाकों में ही नहीं, बल्कि यह गाना देश के कई राज्यों में लोकप्रिय हुआ था. आप भी सुनें.