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नई दिल्ली, 19 नवंबर : बिजली की तरह थिरकने वाली बॉलीवुड अभिनेत्री हेलन के खूबसूरत हुस्न और कातिलाना अदाओं का खुमार सिनेप्रेमियों के जेहन में आज भी कायम है। 21 नवंबर को जीवन के एक और बसंत में कदम रखने जा रहीं हेलन का नाम सुनते ही अनायास ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’, ‘ये मेरा दिल प्यार का दीवाना’ और ‘महबूबा महबूबा’ जैसे तड़कते-भड़कते गीतों पर हेलन का टूटकर थिरकना याद आ जाता है। Also Read - अब लड़ाकू विमान उड़ाती नज़र आएंगी कंगना रनौत, शुरू की तैयारी

21 नवंबर, 1939 को जन्मी हेलन का पूरा नाम हेलन रिचर्डसन खान है। उनके जैविक पिता का नाम जैराग था। रिचर्डसन उनके सौतेले पिता थे, जोकि फ्रांसीसी एंग्लो इंडियन थे और मां मर्लिन रिचर्डसन बर्मी यानी बर्मा (अब म्यांमार) की थीं। Also Read - Bigg Boss 14: बिग बॉस की वो कंटेस्टेंट जिसने एंट्री के साथ फैला दी सनसनी, 'भाईजान' को भी दिया करारा जवाब!

द्वितीय विश्वयुद्ध में पति के शहीद होने के बाद मर्लिन, हेलन एवं बाकी परिवार को लेकर भारत चली आईं। परिवार मुंबई में रहने लगा, जहां किशोरी हेलन को महसूस हुआ कि सिर्फ मां की नौकरी (नर्स) के सहारे पूरे परिवार को चलाना मुश्किल है। इसलिए उन्होंने स्कूल की पढ़ाई छोड़ मां का हाथ बंटाने का फैसला किया।

लोकप्रिय डांसिंग स्टार कुक्कू उनकी पारिवारिक मित्र थीं। उन्होंने ही हेलन को वर्ष 1951 में ‘शबिस्तान’ में कोरस डांसर के रूप में पेश किया। कई फिल्मों में कोरस गर्ल रहने के बाद हेलन को फिल्म ‘अली लैला’ (1953) और ‘हूर-ए-अरब’ (1955) में सोलो डांसर के रूप में लिया गया। लेकिन उनके डांसिंग करियर में नया मोड़ शक्ति सामंत की फिल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ (1958) के गीत ‘मेरा नाम चिन चिन चू’ से आया। यह उनका पहला बड़ा ब्रेक था।

हेलन ने 1950 के दशक की शुरुआत और 70 के दशक के अंत में हिंदी सिनेमा में नृत्य का पूरा परिदृश्य ही बदल दिया था। हालांकि, अपने विदेशी लुक की वजह से उनको यदा-कदा ही मुख्य नायिका की भूमिका मिली, इसलिए उन्होंने डांस को चुना और उसमें लोहा मनवाया। 1960 से 1970 के दशक के दौरान उन्होंने 700 से अधिक फिल्मों में नृत्य किया।

‘गुमनाम’ (1965), ‘शिकार’ (1968) और ‘ऐलान’ (1971) में हेलन को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, लेकिन वह तीनों के लिए पुरस्कार जीतने में नाकामयाब रहीं। उन्हें आखिरकार 1979 में ‘लहू के दो रंग’ के लिए इस पुरस्कार से नवाजा गया।

उन्होंने ‘गुमनाम’ में एंग्लो इंडियन स्वर्ण खनन कर्मी, ‘एक से बढ़कर एक’ (1976) में जर्मन जासूस, ‘हावड़ा ब्रिज’ में नाइट क्लब डांसर, ‘इंकार’ (1977) में मछुआरिन, ‘लहू के दो रंग’ में बर्मी महिला और ‘हलचल’ (1971) में अफ्रीकी महिला की भूमिका निभाकर साबित कर दिया कि वह बहुरंगी भूमिकाएं निभाने का माद्दा रखती हैं।

हेलन ने 1957 में निर्देशक पी.एन. अरोड़ा से शादी की और अपने 35वें जन्मदिन (1974) पर उनसे अलग हो गईं। 1981 में उन्होंने बॉलीवुड अभिनेता-पटकथा लेखक सलीम खान से शादी की और उनकी दूसरी पत्नी बन गई। हेलन और सलीम ने बेटी अर्पिता को गोद लिया। अर्पिता 18 नवंबर को हैदराबाद में परिणय सूत्र में बंध गईं।

हेलन अपने सौतेले बच्चों सुपरस्टार सलमान खान, सोहेल खान और अरबाज खान की सफलता से बेहद रोमांचित हैं और पति के साथ एक अर्ध-सेवानिवृत्ति की जिंदगी जी रही हैं।

हेलन ने शुरुआत में मणिपुरी डांस में प्रशिक्षण लिया। उसके बाद अपने गुरुजी पी.एल. राज से भरतनाट्यम सीखा। उसके बाद कथक सीखा। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने ही भारतीय फिल्मों को कैबरे और बेले डांस से परिचित कराया।

हेलन 500 से ज्यादा फिल्मों में भूमिका निभा चुकीं हैं। उनपर कुछ किताबें भी लिखी गई हैं। 1973 में मर्चेट-इवोरी प्रोडक्शन ने ‘हेलन-क्वीन ऑफ नॉच गर्ल्स’ नाम से उनके करियर पर 30 मिनट का वृत्तचित्र बनाया था।

हेलन ने 1983 में आधिकारिक तौर पर फिल्मों से संन्यास ले लिया था, लेकिन उसके बाद भी ‘खामोशी’ (1996) और ‘मोहब्बतें’ (2000) फिल्म में अतिथि भूमिकाओं में नजर आईं। उन्होंने बेटे सलमान खान की फिल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ में उनकी मां की भूमिका भी निभाई थी। फिल्म ‘हमको दीवाना कर गए’ (2006) में भी वह नजर आई थीं। 2009 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया।

हेलन कहती हैं कि फिल्मफेयर से लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (1998) मिलना उनके लिए सबसे ज्यादा गौरव की बात है।