Death Anniversary of Mohammad Rafi: आज हिंदी फिल्म संगीत के महान सपूत मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि है. 31 जुलाई 1980 को इस दुनिया में अपने नश्वर शरीर को छोड़कर जाने वाले इस अद्भुत संगीत-साधक को गए लगभग 4 दशक होने को आए हैं, लेकिन उनके गीत आज भी उतने ही ताजा और सुरीले लगते हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के साथ-साथ देश की अनगिनत भाषाओं के गीत को अपनी आवाज देने वाला यह गायक, अपने समय में जितना लोकप्रिय था, उससे रत्तीभर भी कम आज नहीं है. किंवदंती जैसा विशेषण मो. रफी जैसे कलाकारों के लिए होता है, जिनका न होना आपको संगीत में आवाज के अभाव का बोध कराता है. इसलिए तो फिल्म संगीत की एक ऐसी ही हस्ती लता मंगेशकर जब उनकी मौत पर अपना दुख व्यक्त करती हैं, तो पूरी दुनिया गमगीन हो जाती है.

लता मंगेशकर और मो. रफी ने बॉलीवुड में लगभग दो दशक से ज्यादा समय तक एक दूसरे का साथ निभाया था. इस दौरान तमाम अच्छी यादों के साथ कुछ विरोध के पल भी सामने आए. रॉयल्टी विवाद के दौरान लता मंगेशकर की बातों के आगे रफी को झुकना पड़ा था. इसको लेकर कुछ दिन इंडस्ट्री में दोनों के बीच अनबन भी रही. लेकिन संगीत ने यह अलगाव ज्यादा दिनों तक नहीं रहने दिया. यह अलग बात है कि इस विवाद के कुछ वर्षों बाद मो. रफी का निधन हो गया. उस दिन लता मंगेशकर का दर्द उनकी जुबां पर छलक आया. भवानीलाल भारतीय की किताब बॉलीवुडनामा कहता है- लता ने मो. रफी की मौत के बाद कहा था, ‘क्या कहूं? समझ में नहीं आता. आसमान का चांद अस्त हुआ या फिल्म संगीत का सूर्य?’

24 दिसंबर 1924 को पंजाब के अमृतसर के पास छोटे से गांव कोटला सुल्तानसिंह में जन्मे रफी अपने माता-पिता के सबसे छोटे बेटे थे. पंजाब की मिट्टी और सूफी संस्कृति, उनके गांव के इर्द-गिर्द बसी थी. जाहिर है बालक रफी का इससे अछूता रह जाना नामुमकिन ही था. 15 साल की उम्र में रफी ने अपने घर में पहली बार गायक बनने की इच्छा जताई. पिता ने विरोध किया, लेकिन बड़े भाई हामिद साहब सहमत थे. सो पिता को बिना बताए उन्होंने रफी को इस राह पर चलने की सीख दी. फिर जो हुआ, वह इतिहास है. लाहौर में केएल सहगल की मौजूदगी में मंच पर गाना, पंजाबी फिल्म ‘गुलबलोच’ में पहली बार मौका मिलना और इसके साथ ही हिंदी फिल्मों में इंट्री. रफी की आवाज इतनी साफ और सुस्पष्ट थी कि कोई भी संगीतकार उनके मोहपाश से खुद को अलग नहीं कर पाता था.

बॉलीवुड में मशहूर संगीतकार नौशाद के साथ रफी की केमिस्ट्री गजब की थी. नौशाद उन प्रमुख संगीतकारों में से थे, जिन्होंने ताउम्र रफी की अजीम शख्सियत को सम्मान दिया और दिलाया. यूं तो मो. रफी की पहली हिंदी फिल्म ‘पहले आप’ थी, लेकिन यह संयोग नहीं है कि नौशाद की फिल्मों के गीत गाकर ही मो. रफी आगे चलकर अजीम फनकार कहाए. चाहे वह फिल्म ‘बैजू बावरा’ का ‘ओ दुनिया के रखवाले’ हो या ‘अनमोल घड़ी’ का ‘तेरा खिलौना टूटा बालक’. रफी किसी एक संगीतकार से बंधकर रहे हों, ऐसा नहीं है. एक पूरी फेहरिस्त है संगीतकारों की, जिन्होंने रफी से गाने गवाए और मशहूर हुए. हुस्नलाल भगतराम, ओपी नैय्यर, शंकर जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और न जाने कितने. रफी सबके चहेते थे.

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में केएल सहगल के बाद मो. रफी अकेले ऐसे गायक बने, जो न सिर्फ संगीतकारों के चहेते थे, बल्कि लाखों संगीतप्रेमियों की जुबां पर भी उनके गीत गूंजते थे. रफी के जमाने में तो ऐसा था ही, आज भी उनके गीतों का मुकाबला कोई गायक नहीं कर पाता है. अलबत्ता, आज के कई मशहूर प्लेबैक सिंगर तो रफी के गाने गा-गाकर ही बड़े कलाकार के रूप में स्थापित हुए हैं. फिल्म संगीत के ऐसे महान फनकार को उनकी पुण्यतिथि पर India.com की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि.