नई दिल्ली. भारतीय सिनेमा की चंद बेहतरीन फिल्में याद करें! ‘देवदास’, ‘मधुमती’, ‘दो बीघा जमीन’ ‘सुजाता’. कुछ महान एक्टर्स को याद करें! दिलीप कुमार, मीना कुमारी, बलराज साहनी, निरूपा रॉय. और इन सबके बाद उस महान फिल्मकार को याद करें, जिसने इन एक्टर्स को आपकी नजरों का नूर बनाया. एक ही नाम आपके जेहन में आएगा…, और वह हैं बिमल रॉय या पुराने दिग्गज कलाकारों के बिमल दा. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में साहित्य को सिनेमा में हूबहू उतारने वाले बड़े फिल्मकारों की जब आप लिस्ट बनाएंगे, तो आपकी कलम सबसे पहला नाम बिमल रॉय का ही लिखेगी. इसकी वजह है.

साहित्य को दृश्य रूप या यों कह लें कि सिनेमाई अंदाज में उतारने में जिस तरह की महारत बिमल रॉय को हासिल थी, उसके पासंग जाने में भारतीय सिनेमा के दूसरे फिल्मकारों को लंबी ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी. क्योंकि बिमल रॉय ने शरतचंद्र चटोपाध्याय यानी शरत बाबू की कहानियों को जिस अंदाज में सिनेमा के पर्दे पर उतार कर रख दिया है, वह अब मील का पत्थर है. गाहे-बगाहे ही कोई फिल्मकार आता है जो अव्वल ऐसी हिम्मत कर पाता है. वरना कई लोगों को तो फिल्म बनाने के बाद क्रिटिक्स यानी आलोचकों की इतनी बुरी निंदा झेलनी पड़ती है कि दूसरे हिम्मत नहीं कर पाते. लेकिन बिमल रॉय इसमें भी दुस्साहसी थे. वे खुद कहते थे कि शरत बाबू की कहानियों को पर्दे पर उतारने के बाद समीक्षक चाहे जितनी आलोचना कर लें, मैं उनकी कहानियों पर फिल्म बनाने का लोभ नहीं छोड़ूंगा. क्रिटिक्स से न डरने वाले ऐसे महान फनकार की आज पुण्यतिथि है.

बलराज साहनी पर फिल्माया गया ‘दो बीघा जमीन’ का यह गाना सुनें और याद करें बिमल रॉय को.

भारतीय सिनेमा को बेहतरीन फिल्मों की सौगात देने वाले बिमल रॉय का जन्म 12 जुलाई, 1909 को ढाका के सुआपुर में हुआ था, जो अब बांग्लादेश का हिस्सा है. वह भले ही जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे लेकिन उनकी फिल्मों ने हाशिए पर मौजूद लोगों के दुख-दर्द को बखूबी बयां किया. हिंदी और बंगाली में फिल्में बनाने वाले बिमल रॉय की ‘दो बीघा जमीन’, ‘सुजाता’, ‘बंदिनी’ और ‘परिणीता’ आज की मॉडर्न और डिजिटलाइज फिल्मों की कैटेगरी में भले फिट न आती हों, लेकिन जब सिनेमा की कालजयी कृतियों का जिक्र आता है, तो ये फिल्में अपनी बनावट, फिल्मांकन और सोच के धरातल पर आज की सिनेमा से कहीं आगे दिखती हैं. कैंसर की वजह से 8 जनवरी 1966 में सिर्फ 56 साल की उम्र में बिमल रॉय की मृत्यु हो गई. लेकिन बहुत कम दिनों में हिंदी सिनेमा को जो कुछ उन्होंने दिया, वह आज सिनेमा के छात्रों को पढ़ाया जाता है. उनकी फिल्में देखकर नए दौर के निर्देशकों को वैसी फिल्में बनाने की सलाह दी जाती है.

दिलीप कुमार की फिल्म ‘देवदास’ का यह गीत ट्रेजडी-किंग पर फिल्माए गए कुछ बेहतरीन नग्मों में से एक है.

सुरेश शर्मा की पुस्तक ‘बिमल रॉय का देवदास’ में दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार ने बिमल रॉय के निर्देशन में बनी फिल्म ‘देवदास’ के निर्माण का संस्मरण लिखा है. इस फिल्म के निर्माण के दौरान के अपने अनुभवों, खासकर बिमल रॉय की बारीक नजर के बारे में दिलीप कुमार लिखते हैं, ‘मेरे लिए उनके साथ काम करना एक सीख थी. अपने सीखने के दौर में ऐसे निर्देशक के साथ काम करना महत्वपूर्ण था. वे आपको आहिस्ता-आहिस्ता चरित्र की त्वचा के भीतर ले जाते थे. आज हमारे पास संस्थान हैं, जो सिनेमा, अभिनय आदि सिखाते हैं. उस समय ये हमारे पास नहीं थे. हमारे पास तो बिमल रॉय जैसे लोग थे.’ बिमल रॉय के बारे में साफगोई से कही गई यह बात आपको एक शख्सियत के जानकार होने की याद दिलाती है. बिमल रॉय के बारे में एक और दिलचस्प पहलू की तरफ दिलीप कुमार ध्यान दिलाते हैं, और वह है दूसरों की बातों को भी महत्व देने का. बहस-जिरह का. दिलीप कुमार ने अपने अनुभव में लिखा है, ‘बिमल रॉय बैठकी-मिजाज के आदमी थे. वे पटकथा पर उन्मुक्त बहस होने देते थे.’