विवादित फिल्म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का को असंस्कारी फिल्म का तमगा पहनाकर सेंसर बोर्ड ने सर्टिफिकेट देने से इंकार कर दिया। इस बारे में इंडिया.कॉम ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के मीडिया प्रभारी डॉक्टर गुलरेज शेख से विशेष बातचीत की।

गुलरेज ने बताया कि सेंसर बोर्ड का काम फिल्म को किसी भी श्रेणी में रखकर ये तय करना होता है कि किस तरह के लोगों के लिए फिल्म को देखना उचित है. अगर उन्हें ऐसा लगता है कि ये इस फिल्म को केवल व्यस्कों को ही देखना चाहिए तो वे इसे ‘ए’ या कोई अन्य सर्टिफिकेट दे सकते हैं. लेकिन फिल्म को पास ही न करना मुझे तो उचित नहीं लगता. हां, एक बात और जैसा कि सुनने में आया है कि फिल्म नैतिकता की हदें तोड़ती है तो मैं आपको बता दूं, नैतिकता तो भारत में तब भी थी जब हमनें खजुराहों के मंदिर बनाए.

नैतिकता वाली बात तो तब भी थी जब भारत में मुसलमान शासक आए उन्होंने हमारे कल्चर में ऐसा काफी कुछ जोड़ दिया कि फलाना काम करेंगे तो हम अनैतिक हो जाएंगे…फलाना काम करेंगे तो सीना चौड़ा करके चलेंगे। लेकिन क्या कोई कुछ बिगाड़ पाया।  अगर मैं भारतीय सभ्यता और संस्कृति की बात करूं तो वो उदार और संपन्न है, जिसमें हम अपनी सीमाओं को जानते हैं, तो एक फिल्म हमारे कल्चर और हमारी नैतिकता को डगमगा नहीं सकती। मुझे नहीं लगता अगर इस फिल्म में किसी विशेष समुदाय को दिखाया भी है तो कोई बहुत बड़ा गुनाह है और अगर ये फिल्म चल भी जाती है तो मुझे नहीं लगता कि वो दंगे करवा देगी।

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मध्यप्रदेश में मुस्लिम समुदाय ने फिल्मकार प्रकाश झा के खिलाफ फतवा जारी कर दिया, कहा गया कि उन्हें वहां घुसने नहीं दिया जाएगा. इस तरह के फतवे किस हद तक जायज हैं और फतवे की परिभाषा क्या है?

सबसे पहले मैं बता दूं भारत जैसे देश में किसी फतवा जैसी व्यवस्था की जरूरत नहीं है। भारतीय संस्कृति अपने आप में इतनी सुलझी हुई है…उदार है…समृद्ध है कि यहां फतवे की जरूरत ही नहीं है। फतवे का कोई भी संवैधानिक औचित्य नहीं होता। फतवे की राजनीति को तो तुरंत ही रोकने की जरूरत है। इस्लाम में फतवे का कोई अस्तित्व नहीं है। फतवे का अर्थ होता एक निजी विचार. मैं जो अभी आपसे बात कर रहा हूं ये मेरा निजी विचार है। हम जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत।

कामसूत्र भी तो हमारी ही संस्कृति का हिस्सा है तो फिर एक मुस्लिम द्वारा किसी भी बात को इतना विरोध करना मुझे जायज नहीं लगता। फतवा का नाम लेकर आप अपना विचार किसी  के ऊपर अपनी सोच को थोप नहीं सकते हैं। और फतवा तो संवैधानिक है ही नहीं तो इसका अर्थ वैसे भी नहीं रह जाता। फतवा एक विचार है कोई फैसला नहीं है जो हम किसी के लिए भी सुना दें। ये अब एक तरह की राजनीति बन गई है और अब वक्त है कि इस तरह की राजनीति से बाहर निकला जाए। समाज को भी और सरकार को भी चाहिए की बैन लगाए इस तरह के फतवो पर, तभी जाकर कुछ हो पाएगा।

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी का कहना है कि फिल्म में कुछ ऐसे आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है जिससे एक विशेष समुदाय के लोग नाराज हो सकते हैं। वैसे ये भी देखा गया है कि जब भी मुस्लिम महिलाओं की आजादी और विकास की बात होती है तो चारों तरफ विरोध होने लगता है चाहे तो तीन तलाक का मामला ही क्यों ना हो। इसके पीछे की वजह क्या है और आप इससे कितना इत्तेफाक रखते हैं?

सबसे पहली बात तो यह है कि भारत के संविधान से ऊपर भी कोई चीज नहीं है। वो समता का अधिकार देता है, फिर भी भारत में रहने वाला एक पुरुष हो या फिर कोई महिला तो उसमें हम भेदभाव करने वाले या ये तय करने वाले हम कौन होते हैं कि किसको क्या करना चाहिए। हमारी सभ्यता में तो स्वंयवर भी होता था तो इससे ज्यादा नारी सशक्तीकरण की बात औऱ क्या हो सकती है । मुझे नहीं लगता फिल्म में अगर एक बुर्के वाली महिला की कहानी दिखा दी तो ये कोई बहुत बड़े बवाल का कारण बन जाएगा।

जहां तक तीन तलाक की बात है मैंने हमेशा इसका विरोध किया है। आप मुझे एक बात बताइए अगर मैं तीन बार कह दूं, खाना…खाना…खाना तो क्या आपका पेट भर जाएगा। उसी तरह तलाक..तलाक..तलाक कहकर आपने अपनी बीवी को घर से निकाल दिया और सारी जिम्मेवारियों से मुक्त होकर बैठ गए ये कहां तक जायज है. मैं तो इसका पुरजोर विरोध करता हूं। मेरा तो सुप्रीम कोर्ट से ये अपेक्षा और अनुरोध है कि इसे तुरंत बैन किया जाना चाहिए। मात्र तीन शब्द बोलकर आप किसी की जिंदगी के साथ  खेल सकते हैं।

तीन तलाक का  मसला कैसे सुलझाया जाना चाहिए, शरियत के हिसाब से या फिर सुप्रीम को इस पर कोई सख्त एक्शन लेने की जरूरत है?
देखिए, ये मानकर चलिए शरियत कभी भारत न चला सकती है न चलाएगी। भारत संविधान से चलता आया है और इसी से चलेगा। और दूसरी बात है कि एक विकसित समाज में इन सब चीजों की आवश्यकता नहीं है।

मेरा मानना है कि इस तरह के मसलों के पीछे की वजह शिक्षा का अभाव है। ज्ञान की कमी है। कट्टरवाद मुझे नहीं लगता कि इसके पीछे का मुख्य का कारण हैं। यह सब उन मौलवी लोगों का किया धरा है जिनकी रोजी रोटी चलती है इन सब चीजों से। फतवे जारी करवा दिए। तीन तलाक के मुद्दे पर बवाल करने लगे। वास्तविकता तो यह है कि वे चाहते ही नहीं कि सब ठीक हो। विकास से उन्हें कोई लेना देना नहीं है। वो इसपर कट्टरपंथी की तरह अपनी दलीलें देते हैं. और जो आम जन है या फिर हम जिसे कह सकते है कि तरक्की पसंद है। ऐसे लोगों की आवाज निकलने वक्त लगता है। इस आवाज को सशक्त कर दिया जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा।

मैं हमेशा एक बात कहता हूं सरकारों से अधिक समाज हमेशा शक्तिशाली होता है। वो अगर तरक्की पसंद लोगों का साथ दे दे तो कोई भी ताकत देश को सुंदर और विकसित बनाने से रोक नहीं सकती। हमारे देश में खजुराहो है…कामसूत्र है, उस वक्त तो कोई सेंसर बोर्ड भी नहीं होता था फिर भी हमारी संस्कृति टिकी है। उसे एक फिल्म क्या हिला सकती है।

आपका मानना है की महिला प्रधान फिल्में बनती रहनी चाहिए वो चाहें किसी भी धर्म या समुदाय से ताल्लुक रखती हों?
बिल्कुल बनती रहनी चाहिए। जब हमारे संविधान ने ही कोई फर्क नहीं किया तो हम कौन होते हैं झूठे संस्कारों और अनैतिकता का तमगा पहनाने वाले। बात किसी भी धर्म की हो अगर वो महिलाओं की आजादी और विकास की बात करती है तो मुझे इसमें कुछ गलत नजर नहीं आता।

आप मुसलमान होते हुए भी एक सकारात्मक सोच रखते हैं और फतवों के खिलाफ, विकास और उत्थान की बात करते हैं. क्या आपको कभी कट्टरपंथियों से सामना हुआ है और आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है?

बहुत बार। सब हमले हुए हैं। लोग गाली निकालते हैं। फेसबुक पर…ट्वीटर पर भद्दे कमेंट करते हैं. हमें तो सामने से नहीं बोल सकते है क्योंकी पता है जवाब मिल जाएगा। लेकिन हमारे रिश्तेदार के सामने हमारे बारें में भला बुरा कहते हैं। एक बार तो हमारे ऊपर जानलेवा हमला भी हुआ है जिसमें बहुत मुश्किल से बचे हैं।

आपको बता दें प्रकाश झा की बहुचर्चित फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’, जिसे सेंसर बोर्ड ने रिलीज सर्टिफिकेट देने से इन्कार कर दिया था, उसने ग्लासगो फिल्मोत्सव में दर्शक पुरस्कार जीता है. इस फिल्म में रत्ना पाठक शाह और कोंकणा सेन शर्मा अहम किरदारों में हैं. फिल्म चार भारतीय महिलाओं के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है जो सामान्य पारिवारिक जीवन से कुछ ज्यादा चाहती हैं.