नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े डाइरेक्टर सत्यजीत रे का आज जन्मदिन है. उनका जन्म 2 मई 1921 में कोलकाता में हुआ था. सत्यजीत रे ना सिर्फ एक डायरेक्टर थे बल्कि वे एक स्क्रिप्ट राइटर और एक म्यूजीशियन भी थे. रे ने न सिर्फ भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पॉपुलर बनाया, बल्कि ​कई फिल्मकारों को अपने काम से प्रेरित भी किया. हॉलीवुड डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलान ने सत्यजीत रे की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ को फिल्म मेकिंग के इतिहास में बेस्ट फिल्म बताया था. सत्यजीत रे ने भारतीय सिनेमा को भारतीय सिनेमा को पाथेर पांचाली, अपराजितो, चारुलता और द वर्ल्ड ऑफ जैसी शानदार फिल्में दी हैं. Also Read - ये काम करके इतने खुश हैं गुलजार, जैसे मुद्दतों बाद एक सपना हुआ पूरा हुआ हो

ललित कलाओं में ही रही रूचि
इनका जन्म कोलकाता में हुआ. जब सत्यजित केवल तीन वर्ष के थे तो इनके पिता चल बसे. इनके परिवार को सुप्रभा की मामूली तन्ख़्वाह पर गुज़ारा करना पड़ा. राय ने कोलकाता के प्रेसिडेन्सी कालेज से अर्थशास्त्र पढ़ा, लेकिन इनकी रुचि हमेशा ललित कलाओं में ही रही. 1940 में इनकी माता ने आग्रह किया कि ये गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में आगे पढ़ें. माता के आग्रह और ठाकुर के प्रति इनके आदर भाव की वजह से अन्ततः इन्होंने विश्व-भारती जाने का निश्चय किया. शान्तिनिकेतन में राय पूर्वी कला से बहुत प्रभावित हुए. बाद में इन्होंने स्वीकार किया कि प्रसिद्ध चित्रकार नन्दलाल बोस और बिनोद बिहारी मुखर्जी से इन्होंने बहुत कुछ सीखा. मुखर्जी के जीवन पर इन्होंने बाद में एक वृत्तचित्र द इनर आई भी बनाया. Also Read - Bijoya Ray, wife of Satyajeet Ray passed away

ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय से मिली थी उपाधि
राय को जीवन में कई पुरस्कार मिले जिनमें अकादमी मानद पुरस्कार और भारत रत्न शामिल हैं. ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय ने इन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधियाँ प्रदान की. चार्ली चैपलिन के बाद ये इस सम्मान को पाने वाले पहले फ़िल्म निर्देशक थे. इन्हें 1985 में दादासाहब फाल्के पुरस्कार और 1987 में फ़्राँस के लेज़्यों द’ऑनु पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मृत्यु से कुछ समय पहले इन्हें सम्मानदायक अकादमी पुरस्कार और भारत का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान किये गए. मरणोपरांत सैन फ़्रैंसिस्को अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्मोत्सव में इन्हें निर्देशन में जीवन-पर्यन्त उपलब्धि-स्वरूप अकिरा कुरोसावा पुरस्कार मिला जिसे इनकी ओर से शर्मिला टैगोर ने ग्रहण किया.

बीमारी एवं निधन
1983 में फ़िल्म घरे बाइरे पर काम करते हुए राय को दिल का दौरा पड़ा जिससे उनके जीवन के बाकी 9 सालों में उनकी कार्य-क्षमता बहुत कम हो गई. घरे बाइरे का बाकी काम राय के बेटे की मदद से 1984 में पूरा हुआ. 1992 में हृदय की दुर्बलता के कारण राय का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया, जिससे वह कभी उबर नहीं पाए. मृत्यु से कुछ ही हफ्ते पहले उन्हें सम्मानदायक अकादमी पुरस्कार दिया गया. 23 अप्रैल 1992 को उनका देहान्त हो गया. इनकी मृत्यु होने पर कोलकाता शहर लगभग ठहर गया और हज़ारों लोग इनके घर पर इन्हें श्रद्धांजलि देने आए.