नागेश की कोई भी फिल्म सिर्फ थियेटर तक ही सीमित नहीं रहती वो आपके दिल और दिमाग को इस कदर झकझोड़ देती है कि किसी के लिए कुछ कर गुजरने का उबाल फूटने पर मजबूर हो जाए. डोर. लक्ष्मी. इकबाल. धनक, इसी का एक उदाहरण हैं. Also Read - 16 Wives 151 Children: इस बुढ़ऊ की 16 पत्नियां-151 बच्चे, 17वीं शादी की तैयारी, बोला- बीवियों को खुश करना ही मेरा काम

कई साल विदेशों में बिताने के बाद नागेश 1998 में वापस अपने देश लौट आए. उसके बाद नागेश अपने अनुभवों पर आधारित फिल्म ‘हैदराबाद ब्लूज़’बनाई. ये पहली फिल्म थी जिसमें बतौर डायरेक्टर उन्होंने काम किया. और खुद एक्टिंग भी की. एक निर्देशक के तौर पर नागेश ने वो फिल्म भारत के नहीं बल्कि अमेरिकी दर्शकों के लिए बनाई थी. हिंदी सिनेमा में नागेश को पहचान तब मिली जब उन्होंने फिल्म इकबाल का निर्देशन किया. Also Read - तांडव के बाद नई वेब सीरीज़ में मर्डर मिस्ट्री सुलझाते नज़र आएंगे Sunil Grover, इस दिन रिलीज़ होगी Sunflower

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फिल्म 18 साल के एक गरीब गूंगे-बहरा लड़के की कहानी है जो क्रिकेटर बनना चाहता है. गरीबी और शारीरिक समस्याओं को पार कर इकबाल का क्रिकेटर बनने का सपना पूरा होता है. उसके इस सपने को पूरा कराने में शराबी कोच (नसीरुद्धीन शाह) मदद करता है. बेहद मार्मिक अंदाज़ में गढ़ी गई ये कहानी एक क्रिकेटर के संघर्ष को पर्दे पर दिखाती है.

इस फिल्म के लिए नागेश को नेशनल अवार्ड भी मिला. नागेश अभी तक अपने निर्देशन से 13 फिल्मों को तराश चुके हैं जिनमें से 8 फिल्मों में उन्होंने अभिनय भी किया है.

उनकी फिल्म लक्ष्मी ने भी समीक्षकों से काफी तारीफें पाई थी. ‘लक्ष्मी’ की कहानी प्रेरित है, कई सच्ची घटनाओं से, जो इस देश में धड़ल्ले से हो रहा है. ‘लक्ष्मी’ एक आइना है, समाज का जहां देह व्यापार अब भी फल-फूल रहा है. ‘लक्ष्मी’ को पाम अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव में कई अवार्ड मिले.

इंजीनियरिंग छोड़कर फिल्मी पेशे में आने वाले नागेश ने चैनल को दिए इंटरव्यू में बताया था कि वैसे तो मेरे परिवार वाले बेहद उन्मुक्त विचार के हैं लेकिन फिर भी एक मिडिल क्लास फैमिली का ऐसा माहौल रहता है कि आप एक साधारण सी नौकरी करके एक आम जिंदगी व्यतीत करें. मिडिल क्लास फैमली रिस्क लेने से डरती है.आपके पास ज्यादा कुछ सोचने का ऑप्शन ही नहीं होता.

फिर एक दिन, ‘मैंने सोचा कि आखिर मैं कर क्या रहा हूं, और करना क्या चाहता हूं.’ जब भी मुझसे कभी कोई सवाल किया जाता था कि अब आप खुद को कहां पाते हैं तो मैं डर जाता था. फिर ऐसे ही एक फिल्म बनाई और किस्मत से लोगों ने उसे पसंद किया बस इस सफर की शुरुआत हो गई.

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नागेश की फिल्म ‘धनक’ को भी लोगों ने काफी पसंद किया. धनक की कहानी आठ साल के बच्चे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो कुछ देख नहीं सकता. उसकी बहन उससे वादा करती है कि वह उसके नौवे जन्मदिन के पहले उसकी आंखों की रोशनी वापस ले आएगी.

नागेश 30 मार्च को 50 साल के हो गए हैं. हैदराबाद में जन्मे. उस्मानिया यूनिवर्सिटी में पढ़े. स्कॉलरशिप मिली तो 1988 में अमेरिका की जॉर्जिया टेक यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की डिग्री करने गए. पहली फीचर फिल्म “हैदराबाद ब्लूज़’ की स्क्रिप्ट लिखी. स्त्रियां नागेश की हर फिल्म में मजबूत होती हैं.

‘3 दीवारें’ (2003) की चंद्रिका, ‘इकबाल’ (2005) की खदीजा और ‘आशाएं’ (2010) की पद्मा ऐसे ही अन्य पात्र हैं. नागेश में सबसे दिलचस्प बात ये है कि उन्हें आज भी अच्छी फिल्म बनाने की चाह रखते हैं न की पैसा कमाने की. उनके अंदर ये फिल्मी कीड़ा ऐसा है जो खुद भी जागता है और दर्शकों को भी जगाए रखता है.