जिंदगी अगर इतनी ही हसीन होती तो क्या बात होती? हमारे अनुसार ही चलती रहती तो क्या बात होती? हिंदी सिनेमा की इंडस्ट्री…चकाचौंध से भरी. लाइट…कैमरा….एक्शन की आवाजें चारों तरफ गूंजती. लेकिन जिंदगी उतनी ही खाली. बेवजह. नीरस. प्यार को तरसती….ऐसी ही जिंदगी का एक हिस्सा दुनिया के सर्वकालिक महान फिल्मकारों में शुमार गुरु दत्त की लाइफ में आया. एक-एक लम्हा जैसे सदियों सा बीत रहा था. मुश्किलें शुरुआत से ही थीं. पैसों की कमी की वजह से माता-पिता में अक्सर लड़ाई होती थी. सात महीने के भाई की मौत ने उन्हें तोड़ दिया था. यही वो दर्द था जो उनकी फिल्मों में भी दिखाई दिया. गुरुदत्त का जन्म बेंगलुरु में वसुथ कुमार शिवशंकर पादुकोण और वासंती पादुकोण के घर हुआ था. उनके माता-पिता कर्नाटक के दक्षिण कनारा जिले के एक गांव पैनबूर में बस गए थे. उनके पिता शुरू में एक हेडमास्टर थे और फिर एक बैंक कर्मचारी तथा उनकी मां वासंती, हालांकि शुरू में एक गृहिणी रहीं जो बाद में एक स्कूल में पढ़ाने लगी थीं. एक एक्टर के साथ-साथ फिल्म निर्माता, प्रोड्यूसर भी रहे गुरु दत्त साहब का 9 जुलाई को जन्मदिन है. 

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1953 में गुरुदत्त जब स्वयं संघर्षरत थे तब उन्होंने गायिका गीता रॉय से विवाह किया. गुरुदत्त की वैवाहिक जिंदगी अच्छी नहीं थी. आए दिन पत्नी के साथ मनमुटाव होने से वो परेशान थे. दिग्गज अभिनेत्री वहीदा रहमान से उनके प्रेम सम्बन्धों की भी चर्चा खबरों का हिस्सा बनी. वहीदा को हिन्दी फिल्मों में लाने का श्रेय भी गुरु दत्त को ही था.

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अवसादी किरदारों में गुरुदत्त निखर कर आते थे. प्यासा, कागज के फूल इसके क्लासिक उदाहरण हैं. मगर कागज के फूल की असफलता ने गुरुदत्त को तोड़ दिया. वह इस निर्णय पर आए कि अब कभी निर्देशन नहीं करेंगे. ‘प्यासा’ कि बात करें तो उससे जुड़ी एक और घटना काफी दिलचस्प है. ‘प्यासा’ के शुरुआती दिनों में यह फैसला लिया गया था कि फिल्म की कहानी कोठे पर आधारित होगी. लेकिन दत्त साहब कभी कोठे पर नहीं गए थे. लेकिन इस फिल्म की वजह से उन्हें जाना पड़ा. दत्त जब कोठे पर गए तो वहां का मंजर देखकर हैरान हो गए. उन्होंने देखा कोठे पर नाचने वाली लड़की कम से कम सात महीनों की गर्भवती थी, फिर भी लोग उसे नचाए जा रहे थे. गुरु दत्त ये देखकर उठे और अपने दोस्तों से कहा ‘चलो यहां से’ और नोटों की एक मोटी गड्डी जिसमें कम से कम हजार रुपये रहे होंगे, उसे वहां रखकर बाहर निकल आए. इस घटना के बाद दत्त ने कहा कि मुझे साहिर के गाने के लिए चकले का सीन मिल गया और वह गाना था, ‘जिन्हें नाज है हिन्द पर हो कहां है.’

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फिल्म निर्देशन के वक्त गुरु इस बात को बखूबी समझ गए थे कि अगर मुसलमान दर्शकों को कोई फिल्म पसंद आ जाती है तो वो उसे बार-बार देखते हैं. इस बात का ख्याल रखते हुए उन्होंने ‘चौदहवीं का चांद’ फिल्म बनाई. इस फिल्म को सही मायने में मुसलमानों की सामाजिक फिल्म कहा जाता है.

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गुरु दत्त को कोलकाता से ख़ास प्यार था. उनका बचपन वहीं गुज़रा था. जब वो कोलकाता जाते थे तो गोलगप्पे और विक्टोरिया मेमोरियल के लॉन में बैठकर झाल मुड़ी ज़रूर खाते थे.

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‘प्यासा’ बनने के दौरान गीता और उनके बीच दूरियां आनी शुरू हो गईं. कारण था उनकी अपनी हीरोइन वहीदा रहमान से बढ़ती नज़दीकियाँ.  एक दिन गुरु को एक वहीदा की कथित चिट्ठी मिली. जिसमें लिखा था. “मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. अगर तुम मुझे चाहते तो आज शाम को साढ़े छह बजे मुझसे मिलने नारीमन प्वॉइंट पर आओ. तुम्हारी वहीदा.” जब गुरु दत्त ने ये चिट्ठी अपने दोस्त अबरार को दिखाई तो उन्होंने कहा कि मुझे ये नहीं लगता कि ये चिट्ठी वहीदा ने लिखी है. इस बात की तरह तक जाने के लिए दोनों चुपके से उस जगह जाकर देखने लगे कि आखिर इस चिट्ठी को लिखने वाला कौन है. तभी उन्होंने देखा गीता दत्त और उनकी दोस्त स्मृति बिस्वास एक कार की पिछली सीट पर बैठी किसी को खोजने की कोशिश कर रही हैं.  घर पहुंच कर दोनों में इस बात पर ज़बरदस्त झगड़ा हुआ और दोनों के बीच बातचीत तक बंद हो गई.

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आख़िरी रात

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार 9 अक्तूबर को उनके दोस्त अबरार अलवी उनसे मिलने गए तो गुरु दत्त शराब पी रहे थे. इस बीच उनकी गीता दत्त से फ़ोन पर लड़ाई हो चुकी थी. कहा जाता है कि वे अपनी बेटी से मिलना चाहते थे लेकिन गीता इस बात के लिए तैयार नहीं थीं. गुरु दत्त ने नशे की हालत में ही उन्हें अल्टीमेटम दिया, “बेटी को भेजो वर्ना तुम मेरा मरा हुआ शरीर देखोगी.” गुरु की जिंदगी में दर्द पहले से ही पर्त दर पर्त चढ़ा हुआ था. लेकिन इस दर्द को सहना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा था. अबरार और गुरु ने उस रात साथ खाना खाया फिर घर वापस लौट आए. दिन में उनके पास फोन आया कि गुरु की तबीयत खराब है. खबर पाते ही वे उनसे मिलने घर जा पहुंचे.उन्होंने देखा कि गुरु दत्त कुर्ता-पाजामा पहने पलंग पर लेटे हुए थे. उनके बगल में एक गिलास रखा हुआ था. जिसमें एक गुलाबी तरल पदार्थ अभी भी थोड़ा सा बचा हुआ था. अबरार के मुंह से निकला, गुरु दत्त ने अपने आप को मार डाला है. लोगों ने पूछा आप को कैसे पता? अबरार को पता था, क्योंकि वो और गुरु दत्त अक्सर मरने के तरीकों के बारे में बातें किया करते थे.गुरु दत्त ने ही उनसे कहा था, “नींद की गोलियों को उस तरह लेना चाहिए जैसे माँ अपने बच्चे को गोलियाँ खिलाती है…पीस कर और फिर उसे पानी में घोल कर पी जाना चाहिए.” अबरार ने बाद में बताया कि उस समय हम लोग मज़ाक में ये बातें कर रहे थे. मुझे क्या पता था कि गुरु दत्त इस मज़ाक का अपने ही ऊपर परीक्षण कर लेंगे.

 

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