भारतीय सिनेमा के इतिहास में के. आसिफ यानी करीमुद्दीन आसिफ का अपना एक खास मुकाम है. आसिफ के निर्देशन में बनी फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ को बनने में 14 साल लगे और इसके पीछे की वजह थी कि वह अपनी इस फिल्म को हर लिहाज से बेहतरीन और मुकम्मल बनाना चाहते थे. यह फिल्म अपने दौर की सबसे महंगी फिल्मों में से एक थी. भारतीय फिल्मों को एक अलग ही दौर में ले जाने वाले निर्देशक का जन्म 1922 में आज ही के दिन हुआ था.
के. आसिफ उत्तर प्रदेश के इटावा में पैदा हुए थे. उन्होंने महज आठवीं क्लास तक पढ़ाई की थी. उनका पैदाइश से जवानी तक का वक्त गरीबी में गुजारा था. फिर उन्होंने भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी, भव्य और सफल फिल्म का निर्माण किया. यह इसलिए मुमकिन हुआ, क्योंकि उन्हें सिर्फ इतना पता था कि उनकी फिल्म के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है.
के. आसिफ की पहली फिल्म कुछ खास नहीं कर सकी थी. वहीं दूसरी फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ ने उन्हें एक अलग मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया. ये फिल्म खुद में एक ऐतिहासिक फिल्म थी क्योंकि इसे बनने में 14 साल लगे थे. बता दें कि ये फिल्म उस वक्त बननी शुरू हुई जब हमारे यहां अंग्रेजों का राज था. जानकारी के मुताबिक ये उस दौर की सबसे महंगी फिल्म थी, इस फिल्म की लागत तक़रीबन 1.5 करोड़ रुपये बताई जाती है जो उस समय के हिसाब से काफी ज्यादा मानी जाती है.
इंडियन सिनेमा को करीब से जानने वाले बताते हैं कि फिल्म के एक गाने ‘प्यार किया तो डरना क्या’ को फिल्माने में 10 लाख रुपए खर्च किए गए ते. ये उस समय की एक बड़ी रकम थी जिसमें एक पूरी फिल्म बन कर तैयार हो जाती थी. सबसे दिलचस्प फैक्ट एक ये भी है कि 105 गानों को रिजेक्ट करने के बाद नौशाद साहब ने इस गाने को चुना था.
-इनपुट एजेंसी
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