नई दिल्ली. आज विश्व रंगमंच दिवस है. वर्ष 1961 में इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट ने इसकी शुरुआत की थी. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रंगमंच की विधा को बढ़ावा देने और रंगकर्मियों द्वारा कला के संदेश को फैलाने के लिए यह दिन हर वर्ष मनाया जाता है. रंगमंच दिवस एक अवसर है उन रंगकर्मियों को याद करने का जो इस विधा के जरिए खुद को समाज से जोड़े रखते हैं. यह जानते हुए भी कि थियेटर आज की तारीख में आजीविका का बहुत कठिन साधन है, फिर भी ये रंगकर्मी धैर्य के साथ अपने पथ पर डटे हुए हैं. थियेटर से जुड़े रहना आज कितना मुश्किल है, इस बारे में India.Com ने दिल्ली में कई वर्षों से रंगमंच की दुनिया से जुड़े नाटककार मोहन जोशी से बात की. आइए पढ़ते हैं बातचीत के प्रमुख अंश. Also Read - 'इंडिया' शब्‍द हटाकर 'भारत' या 'हिंदुस्तान' करने की पिटीशन पर SC में 2 जून को सुनवाई

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शहरों में नाटक करना आज कठिन है. जो लोग थियेटर कर रहे हैं वे स्वेच्छा से इस विधा में हैं या फिर थियेटर उनका ‘पैशन’ है. या फिर दिल्ली जैसे शहर में तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े लोग ही अच्छे तरीके से थियेटर कर रहे हैं. थियेटर करने वाले छोटे-छोटे समूह जरूर हैं, लेकिन वे भी नियमित तौर पर नाटक नहीं कर पाते हैं. क्योंकि आज एक नाटक करने में शुरुआत से उसकी प्रस्तुति तक कम से कम लाख रुपए का खर्च पड़ जाता है. दिल्ली या बड़े शहरों में नाटकों के लिए सस्ती जगह नहीं है. ऐसे में ऑडिटोरियम बुक कराना टेढ़ी खीर है. अगर कोई रंगकर्मी एक नाटक तैयार भी कर ले, तो उसे पेश करने के लिए जगह तलाशना भी आसान काम नहीं है. क्योंकि कलाकारों और प्रस्तुति के खर्च से इतर ऑडिटोरियम का किराया भी कम नहीं होता. महीने-दो महीने की रिहर्सल के बाद नाटक करने के लिए जगह न मिले तो रंगकर्मी निराश हो जाते हैं. यह ठीक है कि थियेटर से जुड़े ऐसे समूहों को सरकारी मदद भी मिलती है, लेकिन यह ‘आर्थिक सहयोग’ कितना है और कैसे मिल पाता है, इसका वर्णन कठिन है. खासकर शनिवार और रविवार को, जिस दिन दर्शकों के मिलने की उम्मीद होती है, तो ऑडिटोरियम मिलना और भी मुश्किल है. ऐसे में कलाकारों को न्यूनतम वेतन जितनी राशि भी नहीं मिल पाती है.

लोग आगे आएंगे तो जिन्दा रहेगा थियेटर

थियेटर लोक कला है. लोग ही इसे जिन्दा रख सकते हैं. सरकार के भरोसे रहकर थियेटर नहीं चलाया जा सकता. सरकार ज्यादा से ज्यादा आर्थिक सहयोग कर सकती है. साल में एक बार या दो बार नाटक के नाम पर अनुदान दे सकती है. इससे काम नहीं चलेगा. सालभर नाटक करने के लिए सरकार कितनी बार आपकी मदद करेगी? हमारे देश में रंगमंच का इतिहास लोगों से जुड़ा है. पहले गांवों में नाटक होते थे. उसमें ग्रामीणों की भागीदारी होती थी. इसलिए लोक कला के रूप में ही थियेटर का विकास हुआ. आज जब नाटक शहरों में पल-बढ़ रहा है, तो जाहिर है लोगों को ही इसमें अपनी भागीदारी दिखानी पड़ेगी. लोग थियेटर देखेंगे तो थियेटर होगा. लोग ही जब रुचि नहीं लेंगे तो कलाकार या रंगकर्मी अपने बलबूते कितने दिन इसे चला पाएगा. आज थियेटर देखने वालों की संख्या कम हो गई है. लोग आते ही नहीं. हालांकि अब बुक माई शो पर टिकट बुक कराने की सुविधा मिलने लगी है. लेकिन यह भी कई बार बड़े कलाकारों के नाटकों तक सीमित हो जाता है. वीकेंड में अगर किसी बड़े कलाकार या नामी-गिरामी संस्था का नाटक है तो छोटे समूहों को उनके नाटक देखने वाले दर्शक ही नहीं मिलते.

मोहन जोशी एक नाटक के दृश्य में.

मोहन जोशी एक नाटक के दृश्य में.

 

आजीविका का साधन बने तो निकलेगी राह

दिल्ली में कई ऐसे कलाकार हैं जो रात में गार्ड की नौकरी करते हैं और सुबह में थियेटर. कई लोग रिहर्सल करने के लिए 5-6 किलोमीटर पैदल चलकर आते हैं. उन्हें नाटक वाले दिन ऑडिटोरियम तक पहुंचने के लिए भी विशेष परिश्रम करना पड़ता है. घर चलाने के लिए थियेटर से जुड़े कलाकारों के पास नियमित आय का कोई जरिया नहीं. यह बात हमें समझनी होगी कि आज भी घरों में थियेटर करने वाले बेटे या बेटी को तवज्जो नहीं दी जाती, क्योंकि इससे कुछ कमाकर लाने की स्थिति नहीं बन पाई है. ऐसे में जिन लोगों के पास अपना या कोई वैकल्पिक व्यवसाय है, वे ही थियेटर से जुड़ते हैं. ऐसे में आजीविका का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है. इस संबंध में सरकार को आगे आना होगा. थियेटर को एजेंडा बनाना होगा. मेरे विचार से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसी संस्थाएं जो देश के विभिन्न शहरों में काम कर रही है, उनमें रोजगार के विकल्प तलाशने होंगे ताकि नाटकों की पढ़ाई करने वाले या रंगकर्म से जुड़े लोगों को स्थाई रोजगार मिले.

रंगकर्मियों को सिखाया जाए थियेटर मैनेजमेंट

नाटक या रंगकर्म से जुड़ा कोई व्यक्ति आजीविका पाने से महरूम न हो, इसके लिए सरकार को गंभीर तौर पर प्रयास करने होंगे. मेरे विचार से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसी नाटक प्रशिक्षण संस्थाओं में थियेटर मैनेजमेंट का कोर्स पढ़ाया जाना चाहिए. इसमें थियेटर की वर्तमान हालत, रंगकर्मियों का संघर्ष आदि पढ़ाया जाए. ताकि रंगकर्म में आने वाले या थियेटर से जुड़ने वालों को कोर्स पूरा करने के बाद के हालात की जानकारी रहे. ऐसे ही प्रयासों से थियेटर हमारे समाज में जिन्दा रहेगा.

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