कहां से शुरू करें. किस गाने की बात करें, किस गज़ल की बात करें. किस दर्द की बात करें, या फिर किस फसाने की बात करें. वो जो गुनगुनाते थे दबे लबों से हमेशा, वो रिसती हुई किस कसक की बात करें. गज़ल सम्राट जगजीत भले ही हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज का जादुई रिश्ता आज भी रगों में ताजगी भर देता है. जगजीत सिंह ने 150 से ज्यादा एलबम बनाईं. फिल्मों में गाने भी गाए, लेकिन ग़ज़ल व नज्म के लिए वे विशेष रूप से लोकप्रिय हैं. सत्तर का दशक जगजीत सिंह के लिए बेहतर रहा. इसी दशक में उनकी पहली अल्बम रिलीज हुई ‘अनफॉरगेटेबल्स’. इसी दौरान बासु भट्टाचार्य की फिल्म आविष्कार में उन्होंने गाया- बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए. जगजीत सिंह हिंदी सिनेमा को बेहतरीन गानों और ग़ज़लों से नवाज़ा. एक दिन वे किसी कार्यक्रम में गा रहे थे ‘दर्द से मेरा दामन भर दे’. वो गा रहे थे. और गाते-गाते रोते जा रहे थे. कहते हैं अगर आप किसी से दिल से जुड़े होते हैं तो उसके साथ बुरे होने का अहसास आपको भी पहले ही हो जाता है. जैसे ही वो कार्यक्रम खत्म हुआ. उनके इकलौते जवान बेटे की मौत की खबर आई. किसी भी बाप के लिए अपने बेटे की अर्थी उठाने से बड़ा सदमा और क्या हो सकता है. उनकी पत्नी चित्रा सिंह को तो इतना सदमा पहुंचा कि उन्होंने उसके बाद से गाना ही छोड़ दिया. इस दंपत्ति ने अपना आखिरी संयुक्त एल्बम ‘समवन समवेयर’ पेश किया उसके बाद से जगजीत केवल अकेले गा रहे थे.उनकी आवाज में सुनिए कुछ ग़ज़लें Also Read - Jagjit Singh Death Anniversary: जब गाते-गाते रो रहे थे जगजीत सिंह, गाना खत्म होते ही उजड़ गया था संसार

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जगजीत सिंह की लोकप्रियता बरकरार थी. लेकिन उम्र बढ़ती गई. डॉक्टर्स ने आराम करने की सलाह दी. लेकिन वे रुकने को तैयार नहीं थे. उनकी ख्वाहिश थी कि सत्तर साल की उम्र में सत्तर कन्सर्ट करेंगे. लेकिन वो नहीं माने यहां-वहां, इधर-उधर के कार्यक्रम करते चले गए.फिर एक दिन खबर आई की उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ. कुछ हफ्तों वे अस्पताल में जिंदगी की लड़ाई लड़ते रहे. और फिर…..वहीं हुआ जिसका सभी को स्वीकार करना मुश्किल था. 10 अक्टूबर 2011 को  वो हमेशा के लिए चले गए इस दुनिया से. बिना किसी संदेश के….न जाने कौन से देश…