भारतीय राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के रचयिता व एशिया के पहले नोबल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की अाज जयंती है. 7 मई 1861  को  जन्में टैगोर ने अपने जीवनकाल में उपन्यास, निबंध, लघु कथाएं, नाटक व गानों की रचना की. आज गुरुदेव की जयंती पर जानिए उनकी प्रसिद्ध रचना ‘काबुलीवाला’ पर बनी फिल्म के बारे में जो कि पिता और बेटी के प्यार व भावनाओं को दिखाती है. Also Read - Manna Dey Death Anniversary: 4000 से ज्यादा गाना गाने वाले मन्ना डे की उस वक्त जेल जाने की आ गई थी नौबत

डायरेक्टर: हेमेन गुप्ता Also Read - 'कातिया' बनकर कहर मचाने वाले डैनी की Bioscopewala का पोस्टर रिलीज

प्रोड्यूसर: बिमल रॉय Also Read - Manna Dey Birthday Special: 4000 से ज्यादा गाना गाने वाले मन्ना डे की उस वक्त जेल जाने की आ गई थी नौबत

स्टोरी: रवीन्द्रनाथ टैगोर

स्टार: बलराज साहनी

फिल्म ‘काबुलीवाला’ रवीन्द्रनाथ टैगोर की चर्चित कहानियों पर आधरित है. फिल्म में अभिनेता बलराज साहनी ने काबुलीवाला का किरदार निभाया है. बेहद सुंदर ढंग से एक पिता और बेटी के संबंधों को उजागर करती ये फिल्म आपको अन्दर से झकझोर देगी. समय के साथ एक बेटी कब बड़ी और फिर पराई हो जाती है.  रोजीरोटी की मज़बूरी एक आदमी को उसे अपने घर और वतन से दूर कर देती है. इन सभी चीजों को बड़ी ही खूबसूरती से पर्दे पर दिखाया गया है.

कहानी– फिल्म की कहानी काबुलीवाला (बलराज साहनी) और छोटी से बच्ची मिनी के इर्दगिर्द बुनी गयी है. काबुलीवाला (अब्दुल रहमान खान) एक पठान है जो कर्ज के बोझ से दबे होने के कारण अपना घर और अपनी छोटी बेटी को छोड़कर भारत आता है ताकि यहां से कुछ पैसे कमा कर अपने सारे कर्जे ख़त्म कर सके और घर लौट सके. लेकिन एक बाप होने के नाते वो अपनी बेटी को हर-पल याद करता है.

सड़कों पर काजू बादाम बेचते हुए एक दिन उसे अपनी बेटी की तरह एक छोटी से लड़की मिली जिसका नाम मिनी है. नटखट मिनी के शक्ल में काबुलीवाले को उसके अन्दर अपनी बेटी बुलबुल नजर आती है. दोनों में अच्छी दोस्ती हो जाती है. एक दिन अचानक पैसों के चक्कर में काबुलीवाले के हाथों गलती से एक बईमान आदमी की हत्या हो जाती है जिसके बाद उसे 10 साल की जेल हो जाती है और जब 10 बाद वो मिनी के पास लौटता है तब तक मिनी बड़ी चुकी होती है वो काबुलीवाले को नहीं पहचान पाती है.

जिसके बाद वो सोचता है कि उसकी छोटी बेटी भी बड़ी हो गयी होगी और वो भी उसे पहचान नहीं पाएगी. ये सब सोचकर वो रोने लगता है. ये देखकर मिनी के पिता उसे कहते हैं कि आप अपने घर काबुल जाओ. एक बेटी अपने पिता को कभी नहीं भूल सकती है. काबुलीवाले को कुछ पैसों की मदद करके मिनी के पिता उसे घर जाने के लिए कहते हैं. इस तरह फिल्म की कहानी को एक हैप्पी एंडिंग होती है.

स्क्रीनप्ले- ब्लैक एंड वाइट पर्दे पर बनी ये फिल्म अपने समय कुछ शानदार फिल्मों में से एक है. बेहद कम सुविधाओं में भी एक अच्छी फिल्म बनाया जा सकता है. फिल्म को देखकर ये आपको आसानी से पता चल जाएगा. कैमरा हैंडलिंग बेहद शानदार हैं.

एक्टिंग- बलराज साहनी ने एक काबुलीवाले का दर्द को पर्दे पर जीवंत कर दिखाया है. फिल्म के लिए बलराज साहनी मुंबई के एक काबुलीवाला में एक महीने तक रहे थे. रोजगार और काम की तलाश में बाहर से आया हुआ कोई भी व्यक्ति बेहद मजबूरी में अपना घर और परिवार छोड़ता है. जिसके दर्द को बलराज साहनी ने पर्दे पर उकेरा है.

फिल्म का गीत ‘ए मेरे प्यारे वतन’ आपको जरुर पसंद आएगा. इस गीत को मन्ना डे ने गाया था. आज भी ये गाना लोगों को बेहद पसंद है.   अगर आप पुरानी फिल्मों के दीवाने हैं और कुछ लीक से हटकर कहानी चाहते हैं तो 1961 में रबिन्द्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित फ़िल्म ‘काबुलीवाला’ आपको जरुर पसंद आएगी.