बेहतरीन अदाकार और जबर्दस्त डायलॉग राइटर कादर खान 81 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए. उन्हें सांस लेने की तकलीफ के कारण वेंटिलेटर पर रखा गया था. उनके दिमाग ने भी काम करना बंद कर दिया था. एक वक्त था जब अमिताभ बच्चन उनके काफी करीब थे. कादर साहब ने बिग की कई हिट फिल्मों के लिए डयलॉग भी लिखे थे. हालांकि बाद में किसी बात को लेकर दोनों के रिश्तों में दरार आ गई थी. इसके बारे में हम बाद में चर्चा करेंगे पहले बता दें.

कादर खान के सबसे अच्छे दोस्त थे बिग बी, लेकिन बाद में क्यों कहना पड़ा – ये मेरा अमिताभ नहीं है

एक इंटरव्यू के दौरान जब उनसे अपना फेवरेट डायलॉग पूछा गया था तब खान साहब ने फिल्म मुकदर का सिंकदर के एक सीन को याद करते हुए कहा था- फिल्म में मैं एक भिखारी के किरदार में था और मैं एक कब्रिस्तान में जाता हूं, जहां देखता हूं कि एक छोटा सा बच्चा (अमिताभ बच्चन) एक कब्र के पास बैठा रो रहा है. फिर मैं उस बच्चे को दिलासा देते हुए समझाता हूं कि यहां भी कोई किसी की बहन है, कोई किसी का भाई है, कोई किसी की मां है. इस शहर ए खामोशियों में, इस खामोश शहर में, इस मिटटी के ढेर के नीचे, सब दबे पड़े हैं. मौत से किसको रास्तागारी है? मौत से कौन बच सकता है? आज उनकी तो कल हमारी बारी है. लेकिन एक बात याद रखना जो दुख में भी मुस्कुराता रहता है वहीं मुकदर का सिकंदर कहलाता है. बाद में इसी लाइन को लेकर इस गाने को भी बनाया गया था.


बता दें, कादर खान मुंबई के एम.एच सब्बू सिद्दिकी पॉलिटेक्निक और एम.एच सब्बू सिद्दिकी टेक्निकल हाईस्कूल में सिविल इंजीनियरिंग पढ़ाते थे. इस महान अभिनेता फिल्मी दुनिया में लाने का श्रेय ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार को जाता है. दरअसल, कादर खान को एक्टिंग के अलावा नाटक लेखन का भी शौक था. कॉलेज के एनुअल-डे फंक्शन में उनके नेतृत्व में एक नाटक किया जा रहा था. इसी फंक्शन में बतौर चीफ गेस्ट बनकर आए दिलीप साहब की नजरों ने कादर खान के अंदर की प्रतिभा को पहचाना था और उन्हें मायानगरी की दुनिया में ले आए.

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