कलाकार- कोंकणा सेन, रत्ना पाठक, अहाना कुमार, प्लाबिता
निर्देशक- अलंकृता श्रीवास्तव
अवधि-1 घंटा 58 मिनट
स्टार रेटिंग- 3/5

आखिरकार वो विवादित फिल्म 21 जुलाई को रिलीज हो गई.

सपने देखने का अधिकार हर किसी को है. हमें क्या करना है. क्या पहनना है. क्या सोचना है. क्या खाना है. कहां घूमना है. इसका चुनाव करना बेशक हमारा अधिकार है. इसमें किसी का भी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होना चाहिए. वैसे भी कोई हमें क्यों बताए , हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत. बात सही है. लेकिन हमारी उड़ान दिल औऱ दिमाग के बीच कितनी संतुलित होनी चाहिए ये हमें तय करना है. क्योंकि जिंदगी में सपनों के आलावा और भी कुछ होता है.

कहानी- फिल्म चार मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं पर आधारित है. जिसमें से दो अलग धर्म की हैं. जो अपनी यथार्थ में होने वाली कमी को अपनी कल्पनाओं के माध्यम से पूरा करती हैं. इनके आलावा एक और भी किरदार है जिसका नाम है ‘रोजी’. या फिर यूं कहें एक कल्पना. जो सबको सपना देखना सीखाती है. जिसका वजूद पूरी फिल्म में रहता है. जो बताती है सही अर्थों में जिंदगी को कैसे जिया जाता है. रोजी की दुनिया इस दुनिया से परे है. वहां बस प्यार है. इच्छा है. वो सब कर गुजरने की इच्छा है, जो आप चाहते हैं. आपका दिल चाहता है. रोजी को उम्र की चिंता नहीं. वो इस दुनिया के रस्मों-रिवाज से वाकिफ नहीं. वो तो मस्तमौली है. बड़बोली है. अनजान है. सेक्सी है. मदहोश कर देने वाली है. कहने का मतलब है कि वो एक महिला के अंदर दबी हुई हसरत है जो सपने में पूरी होती है. एक नजर देखिए फिल्म का ट्रेलर

पहली महिला हैं उषा जी यानी रत्ना पाठक जो पूरे मोहल्ले की बुआ है. बच्चों से लेकर बड़े तक उन्हें बुआ कहकर बुलाते हैं. उम्र यही कोई 55 साल की होगी. जिसे अश्लील साहित्य पढ़ने का शौक है. उनकी बढ़ती उम्र में कहीं न कहीं उनकी जवान ख्वाहिशें सारे बंधन तोड़ रही होती हैं. उनके अंदर एक रोजी मचल रही होती है बाहर आने के लिए. सेक्स करने के लिए. किसी की बाहों में भर जाने के लिए.

दूसरी महिला है शीरीन यानी कोंकणा सेन शर्मा. जो एक मुस्लिम औरत हैं. सेल्सगर्ल का काम करती हैं. पति दुबई में रहता है. जब भी घर आता है तो अपनी बीवी को एक जानवर की तरह हर रात बिस्तर पर रोंदता है. पति-पत्नी का एक ऐसा रिश्ता जो बताता है प्यार और भूख में अंतर होता है. शीरीन नहीं चाहती वो सारी जिंदगी एक बच्चा पहनने की मशीन बनकर बिता दे. उसका दिल कुछ और भी करने के लिए मचलता है.

तीसरी महिला थी लीली, अहाना कुमरा. जिसे एक कैमरामैन से बेहद प्यार है. लीला सेक्स की शौकीन है. वो अपने प्रेमी से शादी करना चाहती है लेकिन उसकी मां एक अच्छे कमाऊ लड़के से उसकी शादी करना चाहती है.

चौथी महिला है रिहाना यानी प्लाबिता बोर्थाकुर. उसके मां-बाप चाहते हैं वो एक साधारण लड़की की तरह बुर्के में रहे. लेकिन रिहाना का इस बुर्के में दम घुटता है. वो बाहर निकलने की तरह मछली की तरह तड़पती रहती है. वो जीना चाहती है दूसरी लड़कियों की तरह. रिहाना जींस, शराब और माइली साइरस जैसे रॉकस्टार बनने के सपने देखती है.

सभी की आंखों में बस एक ही सपने हैं ‘लिपस्टिक वाले सपने’. काली अंधेरी जिंदगी को रंग देने वाले सपने. ये सपने कितने पूरे होते हैं ये तो आपको फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा.

अभिनय- सभी कलाकार नहले पर दहला हैं. किसे कम कहना किसे ज्यादा कहना बेमानी होगा. रत्ना पाठक शाह, कोंकणा सेन शर्मा, आहाना कुमरा और प्लाबिता बोर्थाकुर ने कमाल की एक्टिंग की है.

क्यों देखें- फिल्म मजेदार है. सेक्स के लिए पहल करती लड़कियां. गाली देती. डबल मीनिंग बातें करती. अश्लील किताबें पढ़ती लड़कियों को देखने के आलावा और भी बहुत कुछ देखने और समझने लायक है इस फिल्म में. आप किस लिहाज से फिल्म देखते हैं ये आप पर निर्भर करता है. और जहां तक इसमें बुर्के पर हुए बवाल का सवाल है उसका इस्तेमाल बस एक संकुचित विचारधारा के तौर पर हुआ है. इससे ज्यादा कुछ और नहीं.

फिल्म मनोरंजक है लेकिन कहीं न कहीं एक बात मुझे अखरती है कि आजादी की सही परिभाषा क्या वही है जो फिल्म में दिखाई गयी. तो  मुझे  जमती नहीं है. इसका इस्तेमाल और भी कई अच्छे तरीके से. अच्छी दिशा में किया जा सकता था. कुल मिलाकर हम इसे – 3/5 स्टार देते हैं.