हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

पूछते हैं वो के ग़ालिब कौन है?
कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या?

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ
एक कुरआने सुखन का सफ्हा खुलता है
असद उल्लाह खाँ गालिब का पता मिलता है

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

ग़ालिब का जन्‍म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था. उर्दू अदब मिर्ज़ा ग़ालिब का शायराना अंदाज आज भी रगों में दौड़ता है. रंगमच से लेकर टेलिविजन तक ग़ालिब के हर एहसास को बखूबी दिखाया गया है. ग़ालिब की शायरी की सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि वो किसी एक रंग या किसी एक एहसास से बंधे नहीं, हर मौज़ू पर उनका शेर मौजूद है. हिंदी सिनेमा में मिर्जा ग़ालिब के नाम से पहली फिल्म बनी थी. भारत भूषण ने ग़ालिब का किरदार निभाया था. हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी ग़ालिब पर फिल्म बनाकर उन्हें इज्जत बख्शी गई थी. गुलजार ने भी मिर्जा ग़ालिब पर सन् 1988 में एक सीरियल बनाया था. जिसे काफी पसंद किया गया. नसीरुद्दीन शाह ने इसमें ग़ालिब का रोल किया था. इस अंदाज में वे खूब जमे थे. एक वक्त था जब नसीर को देखते ही लोग ग़ालिब पुकारने लगते थे. सुरेंद्र वर्मा का लिखा प्ले कैद-ए-हयात. ये प्ले मिर्जा ग़ालिब की निजी जिंदगी पर आधारित था. इसे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने परफॉर्म किया था.

इस असाधारण व्यक्ति, गालिब का पूरा नाम असदुल्लाह था और उनका तखल्लुस पहले ‘असद’ था बाद में ‘गालिब’ रखा. मिर्ज़ा गालिब ने अपने फारसी के 6600 शेर और उर्दू के 1100 शेर वाले दीवान पूरे किए थे. उनका संग्रह ‘दीवान’ कहलाता है. दीवान का सीधा सा अर्थ है शेरों का संग्रह.बहुत ही छोटी उम्र में ग़ालिब की शादी हो गई थी. ऐसा कहा जाता है कि उनके सात बच्‍चे हुए, लेकिन उनमें से कोई भी जिंदा नहीं रहा सका. अपने इसी गम से उबरने के लिए उन्‍होंने शायरी का दामन थाम लिया. ग़ालिब की मौत 15 फरवरी 1869 को हुई थी. उनका मकबरा दिल्‍ली के हजरत निजामुद्दीन इलाके में बनी निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास ही है.