'15 मिनट कम, लेकिन असर बरकरार', RSS बायोपिक ‘शतक: संघ के 100 वर्ष’ पर मेकर्स का बड़ा दावा

जब कोई संस्था सौ साल का सफर तय करती है, तो उसके हर कदम की कहानी सिर्फ तारीख और घटनाओं तक सीमित नहीं रहती. उसकी सोच, उसके आदर्श, उसके संघर्ष और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही अहम होती है. कुछ ऐसी ही कहानी अब बड़े पर्दे पर दिखाई जाएगी.

Published date india.com Published: January 22, 2026 5:36 PM IST
rss biopic Shatakht 100 Years of the Sangh 15 minutes shorter but the impact remains
rss biopic Shatakht 100 Years of the Sangh 15 minutes shorter but the impact remains

RSS Biopic: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की यात्रा पर आधारित फिल्म ‘शतक: संघ के 100 वर्ष’ अपने विषय के कारण काफी चर्चा में है. फिल्म के निर्माताओं का कहना है कि उनकी प्राथमिकता केवल कहानी के रोचक पहलुओं को दिखाना नहीं है, बल्कि इतिहास के हर पहलू को सच्चाई के साथ सामने लाना भी है. इसी वजह से फिल्म की अवधि 110 मिनट थी, लेकिन विस्तृत समीक्षा और विशेषज्ञों के परामर्श के बाद इसे घटाकर 95 मिनट कर दिया गया.

फिल्म से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि कुछ दृश्य भावनात्मक रूप से आकर्षक थे, लेकिन उनके पीछे पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण नहीं थे. इसलिए निर्माताओं ने 15 मिनट का कंटेंट हटाने का फैसला किया.

फिल्म का ट्रेलर

फिल्म के ट्रेलर लॉन्च पर आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य ने इस कदम की तारीफ करते हुए कहा, ”आज के समय में जब कई जगह विचारधारा और रचनात्मकता के नाम पर तथ्यों के साथ समझौता होता देखा जाता है, ‘शतक’ के निर्माता यह दिखाते हैं कि तथ्य हमेशा सर्वोपरि होते हैं. यह कदम संघ की पारदर्शिता और ईमानदारी को भी दर्शाता है.”

संघ की यात्रा

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उन्होंने बताया कि फिल्म का मकसद किसी प्रकार का प्रचार नहीं, बल्कि संघ की यात्रा का सही परिचय देना है. ‘शतक’ फिल्म संघ की स्थापना से लेकर उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विकास तक की कहानी सिनेमा के माध्यम से दर्शकों के सामने लाती है. इसमें संस्थान के शुरुआती प्रयासों से लेकर समाज पर उसके प्रभाव, उसके कार्यक्रम और कार्यशैली को बड़े ही सहज और सरल ढंग से दिखाया गया है.

पूरी रिसर्च के बाद बनाई गई फिल्म

निर्माताओं ने बताया कि फिल्म को बनाने में कई बैठकें और विशेषज्ञ समीक्षा शामिल रही. हर सीन पर विचार किया गया कि यह सही जानकारी देता है या नहीं. जिन दृश्यों के पीछे ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं थे, उन्हें हटाना ही उचित माना गया. सिनेमा में रचनात्मक स्वतंत्रता और तथ्यपरक ईमानदारी दोनों बनाए रखना बेहद जरूरी है.

कब रिलीज होगी?

फिल्म में दिखाए गए पहलू किसी भी दर्शक के लिए सहज हैं. चाहे वह संघ के शुरुआती कार्यकर्ता हों, समाज में किए गए कार्यक्रम हों या वैचारिक यात्रा, सब कुछ सरल भाषा और स्पष्ट चित्रण के साथ प्रस्तुत किया गया है. फिल्म 19 फरवरी से देशभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित की जाएगी.

(इनपुट एजेंसी)

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