वो एक सीधा-साधा इंसान था. एक लेखक. जो देखता था उसे बिना किसी साज-सज्जा के सीधा शब्दों में उतार देता था. उसे ताम-झाम करना नहीं आता था. उसे सादगी पसंद थी. वो मुंह पर बोल देता था. उसे दिखावा नहीं आता था. वो साहित्कार सहादत हसन मंटो था. जिससे हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा देखा नहीं गया. वो अंदर ही अंदर घुटता था. उस वक्त उसकी कलम चलती थी, और वो बस लिखता था. 11 मई 1912 को अमृतसर में जन्में, पढाई में फिसडडी, तीसरे दर्जे में इंटरमीडियट पास ‘मंटों’ को अलीगढ यूनिर्वसिटी से निकाल दिए जाने के बाद मुम्बई तक का सफर तय किया. मंटो की कहानियां प्याज के छिलके की तरह परत दर परत उतारती हुई नंगी सच्चाईयों से रूबरू कराती थी. लोगों को ये पसंद नहीं आता था. उसे अक्सर अश्‍लील और भद्दा लेखक कह कर लोग तंज कसते थे. लेकिन मंटो ने भी सोच लिया था वो सच लिखेगा. किसी को पसंद आए या नहीं. अश्लीलता के इल्ज़ाम पर वे जवाब में कहते थे- ‘अगर आपको मेरी कहानियां अश्लील या गंदी लगती हैं, तो जिस समाज में आप रह रहे हैं, वह अश्लील और गंदा है. मेरी कहानियां तो सच दर्शाती हैं.’ Also Read - नंदिता दास ने ट्वीट कर बताया, 'इसलिए पाकिस्तान में रिलीज नहीं होगी MANTO'

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साहित्यकार होने के साथ-साथ मंटो एक पत्रकार थे और रेडिओ के लिए भी लिखते थे. शायद यही वजह रही कि वे समाज और समाज को दोहरे चरित्रों को इतना जीवंत कर पाए. मंटो जेल गए. जुर्माने भरे. अश्लीलता के लिये उनकी बहुचर्चित कहानी ‘उपर, नीचे और दरमिंयॉ’ लोगों में शील और अश्लील को लेकर बहस भी छिड़ गई थी. उनकी कहानियों के कलेवर को लेकर कई विवाद रहे और अश्लीलता परोसने के आरोप और मुकदमें भी उन पर चले. लेकिन मंटो ने इन विवादों के बारे में अपने करीबी दोस्त साहिर लुधियानवी से एक बार कहा था, “बदनाम ही सही लेकिन गुमनाम नहीं हूँ मैं.” Also Read - पाकिस्तान में मंटो की स्पेशल स्क्रीनिंग में पहुंचे स्टार्स, भारत में 21 सितंबर को होगी रिलीज

पेश हैं मंटो की  वो कहानियां जो जहन में बस जाती हैं… Also Read - पाकिस्तान में रिलीज हो सकती है नवाजुद्दीन सिद्दिकी की 'मंटो', नंदिता दास कर रही हैं तैयारी

घाटे का सौदा
दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक चुनी और बयालीस रुपये देकर उसे ख़रीद लिया. रात गुज़ारकर एक दोस्त ने उस लड़की से पूछा : “तुम्हारा नाम क्या है? ” लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भिन्ना गया : “हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मज़हब की हो….!” लड़की ने जवाब दिया : “उसने झूठ बोला था!” यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा : “उस हरामज़ादे ने हमारे साथ धोखा किया है…..हमारे ही मज़हब की लड़की थमा दी……चलो, वापस कर आएँ…..!”

काली सलवार
विभाजन पर लिखी एक और कहानी. मंटो की इस कहानी पर साल 2002 में एक हिंदी फिल्म में भी बन चुकी है. जिसमें इरफान खान और सादिया सिद्दीकी और सुरेखा सीकरी ने अभिनय किया था. काली सलवार की कहानी सुलताना नाम की वेश्या के इई-गिर्द है. इस कहानी में वेश्याओं की इच्छाओं और अरमानों को खोल कर रख दिया गया है. इस कहानी में मंटो बताना चाहते हैं कि समाज का यह तबका बस किसी की जिस्मानी जरूरतों को पूरा करने के लिए नहीं है, उनमें भी दिल है, जो इच्छाएं और सपने पालता है.

सॉरी

छुरी पेट चाक करती (चीरती) हुई नाफ (नाभि) के नीचे तक चली गई।

इजारबंद (नाड़ा) कट गया।

छुरी मारने वाले के मुँह से पश्चात्ताप के साथ निकला-“च् च् च्…मिशटेक हो गया!”

हलाल और झटका

“मैंने उसके गले पर छुरी रखी, हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।”

“यह तुमने क्या किया?”

“क्यों?”

“इसको हलाल क्यों किया?”

“मजा आता है इस तरह।”

“मजा आता है के बच्चे…तुझे झटका करना चाहिए था…इस तरह।”

और हलाल करनेवाले की गर्दन का झटका हो गया।

‘सियाह हाशिये’ से

फाइल फोटो

फाइल फोटो

बू
मंटो की कहानी ‘बू’ ने मंटों को अदालत के दरवाजे तक पहुंचा दिया था. जब इस कहानी पर अश्लीलता के आरोप लगने के बाद मुकदमा कर दिया गया था. इस कहानी में मंटो ने एक युवक रणधीर के विचारों और उसके एक लड़की के साथ उसके यौन सम्बंध पर विस्तार से लिखा है. बू पर अश्लीलता के आरोप लगे और इसके बाद मंटो को कानूनी पचड़ों का सामना करना पड़ा था.

गलती का सुधार

“कौन हो तुम?”

“तुम कौन हो?”

“हर-हर महादेव…हर-हर महादेव!”

“हर-हर महादेव!”

“सुबूत क्या है?”

“सुबूत…? मेरा नाम धरमचंद है।”

“यह कोई सुबूत नहीं।”

“चार वेदों में से कोई भी बात मुझसे पूछ लो।”

“हम वेदों को नहीं जानते…सुबूत दो।”

“क्या?”

“पायजामा ढीला करो।”

पायजामा ढीला हुआ तो एक शोर मच गया-“मार डालो…मार डालो…”

“ठहरो…ठहरो…मैं तुम्हारा भाई हूँ…भगवान की कसम, तुम्हारा भाई हूँ।”

“तो यह क्या सिलसिला है?”

“जिस इलाके से मैं आ रहा हूँ, वह हमारे दुश्मनों का है…इसलिए मजबूरन मुझे ऐसा करना पड़ा, सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए…एक यही चीज गलत हो गई है, बाकी मैं बिल्कुल ठीक हूँ…”

“उड़ा दो गलती को…”

गलती उड़ा दी गई…धरमचंद भी साथ ही उड़ गया।

ठंडा गोश्त
मंटो की कहानी ठंडा गोश्त भी विभाजन पर आधारित थी. इस कहानी के चलते मंटो को एक बार फिर कोर्ट के चक्कर काटने पड़े थे. मंटो को उनकी तीन कहानियों बू, काली सलवार और ठंडा गोश्त के लिए उसे तीन महीने की सजा हुई और साथ ही साथ 100 रूपए जुर्माना भी भरना पड़ा.

सआदत हसन मंटो.

मंटो को ग़ालिब बहुत पंसद थे. सुपरहिट साबित हुई फ़िल्म मिर्ज़ा ग़ालिब की कथा मंटो ने लिखी थी. इस फिल्म की शुरुआत होती है जिस ग़ज़ल से होती है उसका एक शेर है- ‘या रब वो ना समझे हैं ना समझेंगे मेरी बात- दे और दिल उनको जो ना दे मुझको ज़ुबां और’. एक सदी से पहले पैदा हुए मंटो के लिए कहा जाता है कि वे अपने समय से पहले पैदा हुए लेखक थे, जिसका खामियाजा उन्होंने कोर्ट के और पागलखाने के चक्कर लगाकर भुगता. मात्र 42 साल की उम्र में इस महान रचनाकार ने 18 जनवरी 1955 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

(कहानियां- साभार गूगल)

 

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