नई दिल्ली. दलित चेतना और दलित विकास की बात सिर्फ गांवों के संदर्भ में नहीं की जानी चाहिए. दलितों के साथ भेदभाव और उन्हें समाज में कमतर दिखाने की समस्या आज शहरों में ज्यादा हो गई है. खासकर, आरक्षण जैसे मुद्दे जिन लोगों की समझ में नहीं आते, जो आरक्षण का विरोध करते हैं, उन्हें फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ देखनी चाहिए. सामंतवादी मानसिकता ने किस तरह से दलितों को उनकी मूलभूत आवश्यकताओं से दूर करके रखा है. उन्हें समाज की मुख्यधारा में आने से रोका जा रहा है, इन समस्याओं को फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ ने बेहतरीन तरीके से उठाया है. ये विचार दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के हैं, जो बीते दिनों दलितों की समस्या पर बनी फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ की स्क्रीनिंग के मौके पर फिल्म्स डिवीजन पहुंचे थे. पवन श्रीवास्तव निर्देशित और सह-निर्माता नेशनल कंवेंशन ऑफ दलित एंड आदिवासी राइट्स (नैक्डोर) की फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ में फिल्मी दुनिया के दो चर्चित नाम भी हैं. इनमें हीरो फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ और ‘फिल्मिस्तान’ से चर्चा में आए अभिनेता रवि साह और भोजपुरी गायिका कल्पना पटवारी हैं.

ऐसी फिल्में टैक्स-फ्री होनी चाहिए
फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ की स्क्रीनिंग के बाद डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने फिल्म की काफी तारीफ की. उन्होंने कहा कि समाज में दलितों की स्थिति और उनकी दुर्दशा को दिखाने के लिए यह फिल्म एक उदाहरण है. उन्होंने ऐसी फिल्मों को ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचाने के मकसद के बारे में कहा, ‘ऐसी फिल्मों को टैक्स-फ्री किया जाना चाहिए. लेकिन जीएसटी सिस्टम लागू होने के बाद राज्यों के हाथ में ये अधिकार नहीं रह गया है. इसलिए केंद्र सरकार को इस बारे में विचार करना चाहिए.’ सिसोदिया ने फिल्म के विषय-वस्तु के बारे में कहा, ‘दलितों के साथ भेदभाव की समस्या सिर्फ गांवों में नहीं है, बल्कि इस मुद्दे पर शहरों में ज्यादा बात होनी चाहिए. फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ को शहरों में ज्यादा से ज्यादा लोग देखें, इसके लिए जरूरी है कि इन्हें टैक्स-फ्री किया जाए.’ उन्होंने फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद लोगों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि आरक्षण के मुद्दे को लेकर आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग भ्रम में है कि इस व्यवस्था को खत्म किया जाना चाहिए. ऐसे में फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ को दिखाया जाना बहुत जरूरी है, जो हमें समाज की जमीनी सच्चाई से रूबरू कराती हैं.

अभिनेता रवि साह को सम्मानित करते दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया.

अभिनेता रवि साह को सम्मानित करते दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया.

 

पॉपुलर सिनेमा से हटकर समाज पर फोकस
ग्रामीण इलाकों में जाति और धर्म के नाम पर भेदभाव के विषय पर आधारित फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ उन मुद्दों को उठाती है, जिनसे बॉलीवुड किनारे किए रहता है. पॉपुलर फिल्मों से हटकर, सामाजिक विषयों को फिल्मों के जरिए उठाने वाले लेखक-निर्देशक पवन श्रीवास्तव की यह दूसरी फिल्म है, जो ज्वलंत मुद्दों पर हमारा ध्यान खींचती है. इससे पहले 2014 में उन्होंने देश के विभिन्न इलाकों से पलायन कर दिल्ली में आकर बसने वाले प्रवासियों पर आधारित फिल्म ‘नया पता’ बनाई थी. सामाजिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों के लिए आर्थिक कमी के बारे में पवन कहते हैं, ‘फिल्म बनाने के लिए काफी पैसे चाहिए होते हैं. खासकर सामाजिक फिल्म के लिए. इसलिए मैंने अपनी पहली फिल्म भी क्राउड-फंडिंग के जरिए बनाई थी. और अब यह ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ भी क्राउड-फंडिंग से ही बनाई है. इस फिल्म के लिए मैंने 4 लाख रुपए क्राउड-फंडिंग से जुटाए.’ स्क्रीनिंग के बाद फिल्म को आर्थिक मदद देने वालों के नाम बताते हुए पवन श्रीवास्तव ने कहा कि ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ को वे विभिन्न फिल्म पुरस्कारों के लिए भी भेजेंगे और इसके बाद इसे आम लोगों के लिए रिलीज किया जाएगा.

फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ की कहानी
फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ की कहानी आपको नई नहीं लगेगी, क्योंकि इसका विषय नया नहीं है. हां, इसकी प्रस्तुति अलहदा है. फिल्म एक 50 वर्षीय दलित के संघर्षों को दिखाती है जो गांव में रहकर जीवनभर अपने अस्तित्व के लिए समाज से लड़ता है, लेकिन हार नहीं मानता. वह शादी के बाद ‘पहली रात’ बिताने के लिए पत्नी को गांव के दबंग ठाकुर के पास भेजने से इनकार कर देता है, बदले में निष्कासन की पीड़ा झेलता है. उसके बच्चे को स्कूल में दलित होने की वजह से अंग्रेजी नहीं पढ़ने दिया जाता, बावजूद इसके बच्चे को शिक्षा दिलाने के प्रति वह गंभीर रहता है. फिल्म का एक डायलॉग, ‘बेटा अंग्रेजी नहीं पढ़ोगे तो बड़ा आदमी कैसे बनोगे’, एक दलित पिता की पीड़ा को ही नहीं बयां करता, बल्कि हमें समाज की कड़वी सच्चाई भी बता देता है. फिल्म में यही बच्चा जब बड़ा होकर स्कूल मास्टर बनता है और स्कूल में ब्लैकबोर्ड पर ‘ओम’ न लिखने के कारण उसे जेल भेज दिया जाता है, उसके बाद भी पिता का हार न मानना, दर्शकों को भावुक कर देता है. दलित पिता की मुख्य भूमिका में जाने-माने अभिनेता रवि साह हैं, पर्दे पर जिनकी मौजूदगी आपको बांधे रखती है. इसके अलावा अभिनेता सिद्धार्थ भारद्वाज और जयशंकर पांडेय भी फिल्म में अहम भूमिकाओं में हैं.

फिल्म के निर्देशक पवन श्रीवास्तव और गायिका कल्पना पटवारी के साथ रवि साह.

फिल्म के निर्देशक पवन श्रीवास्तव और गायिका कल्पना पटवारी के साथ रवि साह.

 

अभिनेता रवि साह को देखना भायेगा आपको
फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ अपनी कहानी और इसमें काम करने वाले कलाकारों की अभिनय प्रतिभा को लेकर भी बेजोड़ है. फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले अभिनेता रवि साह की एक्टिंग का लोहा तो सिने-दर्शकों ने बॉलीवुड फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ और ‘फिल्मिस्तान’ से ही मान लिया था. ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’ में दलित पिता के रोल में रवि साह की अदाकारी और भी खूबसूरत तरीके से उभरकर आई है. फिल्म के कई दृश्यों में साइकिल चलाते दिखे रवि साह ने एक दलित बुजुर्ग की भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है. फिल्म में कई दृश्यों में उनकी चुप्पी और बगैर संवाद के किया गया उनका रोल, थियेटर के एक मंजे कलाकार की क्षमता का भान कराता है. खासकर घर में पत्नी के लगातार बोलते रहने के समय और शहर में मजदूरों के साथ, रवि साह का अभिनय चरम पर दिखता है. फिल्म के कई दृश्य बेवजह लंबे भी हैं, लेकिन इन्हें बोझिल होने से बचाने में अभिनेता रवि शाह की कलाकारी का दम आपको साफ नजर आ जाएगा.