जब किसी फिल्म में शबाना आज़मी और जूही चावला जैसी अनुभवी एक्ट्रेस हो तो आप उस फिल्म से काफ़ी उम्मीद लगाकर बैठते हैं। हम बात कर रहें हैं डायरेक्टर जयंती गिलातर की फिल्म ‘चाक एन डस्टर’ की जो आज रिलीज़ हुई। ये फिल्म आधारित है देश में बदलते एजुकेशन सिस्टम पर। फिल्म ये बताने की कोशिश कर रहा है की कैसे एजुकेशन आज बिजनेस बन गया है। फिल्म का टॉपिक तो काफी बढियां है लेकिन इस टॉपिक के साथ इंसाफ नहीं हो पाया है। बॉलीवुड की ये फेमस एक्ट्रेस नहीं कर पाई सलमान से रोमांस इसीलिए बना लिया ‘भईया’ Also Read - लॉकडाउन डायरी: सोशल मीडिया पर जूही चावला ने खोले कई राज, कहा- रोज सुबह...

कहानी शुरू होती है पब्लिक स्कूल कांताबेन से जहाँ इंदु जी (ज़रीना वाहब) प्रिंसिपल हैं। स्कूल में ज्योति ठाकुर (जूही चावला) और विद्या सावंत (शबाना आज़मी) साइंस और मैथ्स की टीचर हैं। इस फिल्म की विलन हैं कामिनी गुप्ता (दिव्या दत्ता) जो वाईस प्रिंसिपल हैं। स्कूल में सब कुछ ठीक था लेकिन कामिनी मैनेजमेंट के सामने ऐसा खेल रचती हैं वो उनकी बातों में आ जाते हैं। कामिनी का मानना है की एजुकेशन बदलना चाहिए और इसे एक बजनेस के तरीके से देखना चाहिए. इसी चक्कर में इंदु जी को हटाकर कामिनी को फिल्म का प्रिंसिपल बना दिया जाता है। कामिनी स्कूल की पुरानी और अच्छी टीचर्स को बदलकर मॉडर्न टीचर्स को लाना चाहती है ताकि स्कूल में बड़े घर के बच्चे एडमिशन लें। स्कूल टीचर्स और मैनेजमेंट की तकरार इतनी बढ़ जाती है की ये मीडिया में एक बड़ी ख़बर बन जाती है। Also Read - सिर्फ एक शर्ट पहने समंदर में किया था डांस, इस बात से डर गई थीं जूही चावला

इस फिल्म में ये दिखाने की कोशिश की गयी है की देश में ज्ञानी टीचर्स की क्या हालत है। कैसे एजुकेशन सिस्टम बदल गया है। एक ज़माने में गुरु को भगवान् की तरह पूजा जाता था लेकिन आज गुरु का महत्व किसी को नहीं है। फिल्म दिखता है कैसे आज हमारे देश में टीचर्स को वो इज्ज़त और दर्जा नहीं मिलता जिसके वो हकदार हैं। फिल्म के डायरेक्टर चाहते तो वो इस सब्जेक्ट को और अच्छे से दिखा सकते थे लेकिन वो इसमें कामयाब नहीं हो पाये हैं। फिल्म बोरिंग तो नहीं है हाँ लेकिन इतनी ख़ास भी नहीं है। फर्स्ट हाफ आपको अच्छा लगेगा लेकिन सेकंड हाफ थोडा स्लो है। Also Read - उस वक्त जूही चावला को सिर्फ शर्ट पहनकर समंदर किनारे डांस करने को क्यों कहा गया था?

जूही चावला और शबाना आज़मी ने अपने किरदार के साथ इंसाफ किया है लेकिन दिल जीता है दिव्या दत्ता ने। दिव्या ने नेगेटिव किरदार को बखूबी निभाया है।

कूल मिलाकर ये एक अच्छी फिल्म है। आप अपने पूरे परिवार के साथ ये फिल्म देख सकते हैं। ये बच्चों से लेकर बूढों तक को पसंद आएगी। और हाँ ये फिल्म देखते हुए आपको अपने फेवरेट टीचर की याद ज़रूर आएगी।

रेटिंग : * * 1/2