कान: मशहूर अफसानानिगार सआदत हसन मंटो के जीवन पर बनी फिल्म ‘मंटो’ को रविवार को 71 वें कान फिल्म महोत्सव में दिखाया गया. इस मौके पर सैले डेबुसी हॉल में बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद थे. अभिनेत्री नंदिता दास के निर्देशन में बनी इस फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद कास्ट और प्रोडक्शन टीम के 23 सदस्य मंच पर आए. निर्देशक नंदिता ने इस मौके पर कहा, “मंटो 1940 से 50 के समय के बीच की फिल्म है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में जो चल रहा है यह उसके बारे में है.”

उन्होंने कहा, “कान शहर घर की तरह है और यह बेहद खुशी की बात है कि मेरी दूसरी फिल्म का प्रीमियर यहां हो रहा है.” स्क्रीनिंग के दौरान दर्शकों में निर्देशक के पिता और मशहूर पेंटर जतिन दास भी मौजूद थे. स्क्रीनिंग के बाद नंदिता ने कहा, “मेरी फिल्म एक परिवेश में बनी हुई है लेकिन मुझे सबकुछ बताने की जरूरत नहीं है. अगर आप भावनाओं का इस्तेमाल सही तरीके से कर पाते हैं तो फिल्म खुद ही दर्शकों के साथ जुड़ जाती है.”

कौन थे मंटो?
समाज के दलित, उत्पीड़ित लोगों की मजबूरियों और उनके दुख-दर्द को अपना विषय बनाने वाले उर्दू साहित्यकार सआदत हसन मंटो का जन्म 11 मई 1912 को पंजाब के समराला में हुआ था. मंटो न सिर्फ उर्दू में बेहतरीन कहानियां लिखने के लिए जाने गए, बल्कि फिल्म और रेडियो की पटकथा, व्यंग्य, संस्मरण और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने नाम कमाया. महज 4 दशक की अपनी छोटी सी जिंदगी में मंटो ने दुनिया को देखने का जो नजरिया लोगों के सामने रखा, वह आज भी हमें सोचने को मजबूर करता है.

उनकी कहानियों के पात्र मजबूत इरादे वाले होते हैं, जो घोर यातनाएं भोगने के बाद भी अन्याय के खिलाफ सहसा उठ खड़े होते हैं. आप चाहे ‘सबसे ठंडा गोश्त’ पढ़ें या ‘खोल दो’, ‘टोबा टेक सिंह’ या फिर कोई और कहानी, मंटो आपको समाज की कड़वी सच्चाई के इर्द-गिर्द रखते हैं. भारत-पाक बंटवारे को लेकर लिखी गई उनकी कहानियां पढ़कर आपके रोंगटे खड़े जाते हैं. उनका लेखन समाज के अलंबरदारों को इतना परेशान करता था कि मंटो की कई कहानियों पर मुकदमे तक हो गए. जिन पत्रिकाओं ने उनकी कहानियां छापी, उन पर प्रतिबंध लगा दिए गए. लेकिन मंटो का अंदाज न बदला.