नई दिल्ली. आज बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त के जीवन के ऊपर बनी फिल्म ‘संजू’ रिलीज हुई है. इस फिल्म को दर्शकों और आलोचकों से काफी तारीफ हासिल हो रही है. फिल्म ‘संजू’ को संजय दत्त के जीवन से जुड़ी बेहतरीन फिल्म बताया जा रहा है. लेकिन आज हम यहां न तो संजय दत्त की और न ही उनके ऊपर बनी फिल्म की बात करेंगे. हम बात करते हैं भोजपुरी फिल्मों की. संजय दत्त और भोजपुरी भाषा के बीच कोई कनेक्शन, है न हैरान कर देने वाली बात! लेकिन यह सच है. दरअसल, संजय दत्त की नानी, यानी बॉलीवुड की मशहूर अदाकारा नरगिस की मां जद्दनबाई का भोजपुरी फिल्मों से सीधा कनेक्शन है. जद्दनबाई ही वह शख्स थीं, जिन्होंने सबसे पहले भोजपुरी भाषा में फिल्म बनाने की बात सोची थी. यह अलग बात है कि वह इसमें सफल नहीं हुईं और बाद में चरित्र अभिनेता नासिर हुसैन ने भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ बनाई.Also Read - Prithviraj Teaser Out: अक्षय कुमार ने फिर किया धमाल, जबरदस्त होगा युद्ध, कटारी चलाएंगी मानुषी छिल्लर की निगाहें

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पहली महिला संगीतकार भी थीं जद्दनबाई

जद्दनबाई का परिचय केवल इतना ही नहीं है कि वह मशहूर अदाकारा नरगिस की मां या एक्टर संजय दत्त की नानी थीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार होने का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है. वर्ष 1935 में पहली बार उन्होंने सी.एम. लुहार निर्देशित फिल्म ‘तलाश-ए-हक’ में संगीत दिया था. हालांकि दूसरी महिला संगीतकार सरस्वती देवी का अविर्भाव होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. 1936 में हिमांशु राय द्वारा निर्मित, अशोक कुमार और देविका रानी अभिनीत फिल्म अछूत कन्या में सरस्वती देवी ने संगीत दिया था. कला के प्रति यह स्नेह जद्दनबाई को विरासत में मिला था. यही वजह रही कि उनकी बेटी नरगिस, बॉलीवुड में कम समय में ही अपनी अदाकारी से मशहूर हुईं. आज भी नरगिस को बॉलीवुड की प्रतिभाशाली कलाकारों में से एक माना जाता है.

भोजपुरी की एक ठुमरी का कमाल

जद्दनबाई मूलत: बनारस की रहने वाली थीं. भोजपुरी उनकी मातृभाषा थी. उन्हें ठुमरी गायन और नृत्य में पारंगत हासिल थी. लेकिन भोजपुरी भाषा के प्रति प्रेम ने ही मशहूर फिल्मकार महबूब खान को मजबूर किया था कि वर्ष 1943 में बनी फिल्म ‘तकदीर’ में जद्दनबाई की पसंद का एक गीत रखा गया. दरअसल फिल्म ‘तकदीर’ में जद्दनबाई की पसंद और इच्छा से मजबूर होकर भोजपुरी भाषा की एक ठुमरी रखी गई थी. वह गाना इतना पॉपुलर हुआ कि खुद जद्दनबाई और निर्माता महबूब खान को भी हैरानी हुई. इस एक गाने की लोकप्रियता ने जद्दनबाई को यह सोचने पर विवश किया कि फिल्म में एक भोजपुरी ठुमरी इतनी धूम मचा सकती है, तो अगर पूरी फिल्म भोजपुरी में हो तो कितनी धूम मचेगी. मन में यह विचार आते ही वे सिनेमा में सक्रिय उत्तर भारतीय कलाकारों से मिलने-जुलने लगीं.

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अभिनेता कन्हैया लाल ने किया सहयोग

भोजपुरी फिल्मों की दुनिया में बॉलीवुड के कई कलाकारों का महत्वपूर्ण योगदान है. इन्हीं अभिनेताओं में से एक थे मशहूर चरित्र अभिनेता कन्हैया लाल. बॉलीवुड की कई हिन्दी फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभाने वाले कन्हैया लाल भी भोजपुरी क्षेत्र के ही रहने वाले थे. जद्दनबाई की भोजपुरी फिल्म बनाने के प्रयास में अभिनेता कन्हैया लाल ने भी बहुत सहयोग किया था. कन्हैया लाल भी मूलतः बनारस के ही रहने वाले थे तथा बंबई फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिष्ठित और विलक्षण कलाकार के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे. यह अलग बात है कि जद्दनबाई और कन्हैया लाल, इन दोनों की भोजपुरी फिल्म बनाने की कसक अधूरी ही रह गई. इसके पीछे एकमात्र कारण उनकी निजी सीमाएं और उम्रगत विवशताएं ही थीं. बहरहाल, जद्दनबाई की सोच को 1960 के दशक में आकार मिला जब पहली भोजपुरी फिल्म रिलीज हो पाई.

कन्हैया लाल.

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पहली फिल्म ने ही कर ली 75 लाख की कमाई

आज बड़ी संख्या में भोजपुरी की फिल्में बन रही हैं. इनमें से कुछेक को छोड़ दीजिए तो कई फिल्में तो अपनी लागत भी वसूल नहीं कर पाती हैं. लेकिन 1962 में जब पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोरे पियरी चढ़इबो’ महज पांच लाख रुपए में बनी थी. लेकिन रिलीज होने के बाद इसने लोकप्रियता का ऐसा मुकाम हासिल किया, जिसका आज भी कोई मुकाबला नहीं है. इस फिल्म ने उस समय 75 लाख रुपए की कमाई की थी. लोगों ने इसे सिर आंखों पर बैठाया. लोकप्रिय भाषा और इससे संबंधित विषय पर बनी इस फिल्म देखने के लिए गांव-गांव से लोग बैलगाड़ियों से शहर के सिनेमा हॉलों में पहुंचते थे. इस फिल्म को हिट करने में इसके सुमधुर गीत और कर्णप्रिय संगीत का भी बड़ा योगदान था.

(इनपुट- ‘भोजपुरी फिल्मों के सफरनामा’)